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Monday, May 27, 2013

उसके लिए ...... जो खुद एक कविता है





हाँ, बहुत हौले से ही आया था वो
एक मीठे एहसास की तरह
ठंडी मधुर बयार की तरह
जख्मों पे शीतल मरहम की तरह....

लेकिन उसका आना
मुझे छोड़ गया है
अशांत लहरों के बीच
जहां है भावनाओं के ज्वार
असीमित –अपरिमित-निरंतर

शायद ऐसा हो होता है प्रेम
सुकून हैं जहां
वहीं तड़प भी,
औदार्य है,
समर्पण है
लेकिन है बेइंतिहा स्वार्थ भी ....

कि मुझे करना भी नहीं है अलौकिक प्रेम
मेरा प्रेम उतना ही दुनियावी है
जितनी कि मैं
मेरी भावनाएं ....
और सब कुछ तो फिर भी मान लूँ
लेकिन नहीं है गुंजाइश उन ख़यालों की भी
जो तुम्हें बांटने या मुझसे दूर जाने की हिमायत करते हैं ....


तुम्हारे प्रेम में मुझे नहीं पाना देवत्व
शायद शैतान मुझे बेहतर समझ सके
कि उसे शर्म नहीं आती अपनी लालसाओं पर  
और यूं ही डूबती –उतरती रहूँ मैं
उद्दाम लहरों के वेग में
कि शांत किनारे का स्थायित्व
भर देगा मुझे पूर्णता के भाव से
और तुम्हारे प्रेम में
मैं रहना चाहूंगी हमेशा अपूर्ण 
ताकि जब भी तुम्हें पुकारूँ
तुम कर सको महसूस मेरी प्यास 
ताकि जान सको तुम 
कि मैं शैतान  के करीब ही सही
तुम्हें और सिर्फ तुम्हें चाहते जाने के सिवा
नहीं किया मैंने कोई और गुनाह ....
कि तुम्हें पाने और सिर्फ तुम्हें पाने के अलावा
मैंने नहीं पाली कोई वर्जित कामना ....

Monday, July 02, 2012

बिजूका



देह और मन की सीमाओं में 
नहीं बंधी होती है गरीब की बेटी....
अपने मन की बारहखड़ी पढ़ना उसे आता ही नहीं
और देह उसकी खरीदी जा सकती है
टिकुली ,लाली ,बीस टकिये या एक दोने जलेबियों के बदले भी ....

गरीब की बेटी नहीं पायी जाती
किसी कविता या कहानी में
जब आप उसे खोज रहें होंगे
किताबों के पन्नों में ........
वह खड़ी होगी धान के खेत में,टखने भर पानी के बीच
गोबर में सनी बना रही होगी उपले
या किसी अधेड़ मनचले की अश्लील फब्तियों पर ...
सरेआम उसके श्राद्ध का भात खाने की मुक्त उद्घोषणा करती
खिलखिलाती, अपनी बकरियाँ ले गुजर चुकी होगी वहाँ से .....

आप चाहें तो बुला सकते हैं उसे चोर या बेहया
कि दिनदहाड़े , ठीक आपकी नाक के नीचे से
उखाड़ ले जाती है आलू या शक्करकंद आपके खेत के
कब बांध लिए उसने गेहूं की बोरी में से चार मुट्ठी अपने आँचल में
देख ही नहीं सकी आपकी राजमहिषी भी .....

आपकी नजरों में वह हो सकती है दुश्चरित्र भी
कि उसे खूब आता है मालिक के बेटे की नज़रें पढ़ना भी
बीती रात मिली थी उसकी टूटी चूड़ियाँ गन्ने के खेत में ....
यह बात दीगर है कि ऊँची – ऊँची दीवारों से टकराकर
दम तोड़ देती है आवाज़ें आपके घर की
और बचा सके गरीब की बेटी को
नहीं होती ऐसी कोई चारदिवारी ......

गरीब की बेटी नहीं बन पाती
कभी एक अच्छी माँ
कि उसका बच्चा कभी दम तोड़ता है गिरकर गड्ढे में
कभी सड़क पर पड़ा मिलता है लहूलूहान....
ह्रदयहीन इतनी कि भेज सकती है
अपनी नन्ही सी जान को
किसी भी कारखाने या होटल में
चौबीस घंटे की दिहारी पर .......

अच्छी पत्नी भी नहीं होती गरीब की बेटी
कि नहीं दबी होती मंगलसूत्र के बोझ से....
शुक्र बाज़ार में दस रुपए में
मिल जाता है उसका मंगलसूत्र
उसके बक्से में पड़ी अन्य सभी मालाओं की तरह ....

आप सिखा सकते हैं उसे मायने
बड़े-बड़े शब्दों के
जिनकी आड़ में चलते हैं आपके खेल सारे
लेकिन नहीं सीखेगी वह
कि उसके शब्दकोश में एक ही पन्ना है
जिस पर लिखा है एक ही शब्द
भूख... 
और जिसका मतलब आप नहीं जानते ....

गरीब की बेटी नहीं जीती
बचपन और जवानी
वह जीती है तो सिर्फ बुढ़ापा
जन्म लेती है , बूढ़ी होती है और मर जाती है
इंसान बनने की बात ही कहाँ ..... !
वह नहीं बन पाती एक पूरी औरत भी ....
दरअसल , वह तो आपके खेत में खड़ी एक बिजूका है
जो आजतक यह समझ ही नहीं पायी
कि उसके वहाँ होने का मकसद क्या है ....

Monday, April 30, 2012

वह शिला सी मजबूत औरत ....


घर के जालों को हटाना तो दरअसल एक बहाना होता है
अपने मन पर पड़े जाले हटाना चाहती है
खाली बैठने से डरी हुई,
वह बेवजह ही व्यस्त हो जाती औरत ....

ज़िंदगी की दौड़ में,
हर बार प्रस्थान रेखा से शुरुआत करती,
पूरी कर सके दौड़....
इससे पहले ही रोक दी जाती है, 
 तब भी ,खुद को विजेता का तमगा दिये जाने पर
 वह गीली आँखों से मुसकुराती हुई औरत ....

 छोटी सी ज़िंदगी के अंदर
कई –कई जिंदगियाँ जीती,
हर बार एक नया जन्म लेती है ....
लेकिन किसी भी जन्म में
खुद से कहाँ मिल पाती है....
जीवन को जीते हुए भी  
जीवन से विलग,
वह खुद से ही नाराज़, झुंझलाई सी औरत ....

दायीं आँख फड़कने पर,
 कुछ बेचैन से मंत्र बुदबुदा कर ,
 दूर बसे बच्चों को फोन मिलाती ....
 उनके सँजो कर रखे गए सामानों में उन्हे ढूंढती,   
उम्र से भी ज्यादा चिंताएँ बटोर कर ....
वह असमय ही बूढ़ी हो आई औरत .....

अपने अधिकारों को बखूबी जानती है,
डिग्रियों के पुलिंदे को सहेजा है पूरे जतन से,
फिर भी फेंकी गयी थालियों से अपना हुनर तोलती, 
 ताउम्र अपने वजूद को बचाने की कोशिश में,
वह थक कर कुछ रुक गयी सी औरत ....

कुछ भी हो ....
जब तक जिएगी , वह टूटेगी नहीं,
जीने के बहाने गढ़ती ही रहेगी....
अपने सपनों के घर में,
उम्मीदों के नए रंग सज़ा कर
 फिर अकेली ही उसे निहारेगी,
 वह शिला सी मजबूत औरत ....

Saturday, April 07, 2012

वह कुछ नहीं कहेगी....!!


हथेलियों की लाल- हरी चूड़ियाँ खिसका कर
वह टाँकती है कुछ अक्षर
और दुपट्टे के कोने से पोंछ लेती है
अपनी हदें तोड़ते बेशर्म काजल को ....

माँ के नाम रोज़ ही लिखती है वह चिट्ठियाँ
और दफन कर देती है उसकी सिसकियों को
सन्दूक के अँधेरों में
दम तोड़ने के लिए....

वही सन्दूक जिसे माँ ने
उम्मीदों के सतरंगी रंगों से भरा था
और साथ ही भरी थीं कई दुआएं
बिटिया के खुशहाल जीवन की ....

माँ को अलबत्ता भेजी जाती हैं
कुछ खिलखिलाहटें अक्सर ही
जिसे सुनकर थोड़ा सा और
जी लेती हैं वह ....

मर ही जाएंगी वह
गर जानेंगी कि
उनकी बिटिया के माथे पर चिपकी गोल बिंदी से
 सहमा सूरज
 सदा के लिए भूल गया है
देना अपनी रोशनी ….
 और उसके घर अब चारों पहर
बसता हैं सिर्फ अंधेरा ....

कैसे जी पाएँगी वह
गर जानेंगी कि
उसकी मांग में सजी सिंदूर की  सुर्ख लाल रेखा
बंटी हुई है
कई और रेखाओं में
और झक्क सफ़ेद शर्ट पर
रेंगती आ जाती हैं वह 
उसके बिस्तर तक भी ....

कैसे सुन पाएँगी वह
कि पिछली गर्मियों
जिन नीले निशानों पर
लगाया करती थी
वह ढेर सारा क्न्सीलर
वह किसी के प्रेम की निशानी नहीं थे ....

नहीं , वह कुछ नहीं कहेगी....!!
और शायद कभी खुद भी
दफन कर दी जाएगी
किसी सन्दूक में
हमेशा के लिए ….



Friday, March 23, 2012

यह समय है !


यह समय है,
जब हमारे आस-पास रेंग रहे हैं कई बेखौफ गिरगिट
जो पलक झपकते ही हो जाते हैं हरे या भूरे
खुली आँखें भी देखतीं हैं फिर एक भ्रम
मिट जाता है फर्क असली और नकली का...
 यह समय है,
जब निराशा के ग्रहण
निगल लेते हैं इंसानियत का सूरज
और जो सूरज चमक रहा होता है
 उसे उधार लेनी पड़ती है रौशनी
अँधेरों से...
एक ऐसा समय,
जब निष्पक्षता कर देती है अकेला
और अपना वजूद बनाए रकने के लिए
बनना होता है परजीवी
 किसी और की ऊर्जा का
यह समय नहीं,
जिसे जिया जाये अपनी शर्तों पर...
जहां बह सके आदर्शों की कोई धारा
अपने खुद के ग्लेशियर के सहारे...
यह समय है,
जहां नागफनी की फसल पर लेटी मानवता
कराह रही है
घायल...
लेकिन बेअसर है हरेक मरहम
यह समय है,
 जहाँ कई आवाज़ें
शोर ठहरा दी जातीं हैं
और एक अकेली आवाज
गुम हो जाती है कई आवाज़ों के शोर में...
ऐसे ही एक समय में,
विचलित मन
बो रहा है बीज़
प्रार्थनाओं के...
कल शायद लहलहा सके
एक नए समय के अंकुर,
नयी उम्मीदों,
नए सपनों के साथ...  
प्रेम और मैत्री के साथ...
शांति और सह-अस्तित्व के साथ...
उस दिन एक नया सूरज भी निकलेगा
नयी रौशनी के साथ ...

Thursday, March 15, 2012

जननी भोग्या भी बन सकती है.......!!


दायरों और मापदंडों का इतिहास नया तो नहीं .........................
सदियों से धरती की उपाधि से गर्वित मन
इस सच से अनजान भी नहीं
कि जननी भोग्या भी बन सकती है.......
पुराने मानकों से निवृति पाए बिना
अब नहीं पनप सकता है प्रेम
माना की बोये गए सृजन के बीज
लेकिन इनकार करती है वह धरती होने से ...................
जिस पर किया जा सके स्वामित्व
जिसे काटा जोता और बोया जा सके
जिसे ख़रीदा और बेचा जा सके
जिसे रौंदा जा सके निर्मम पद प्रहारों से
और फसल नहीं आये तो
चस्पा कर दिया जाए
बंजर का तमगा ........
दायरे तब भी रहेंगे
मापदंड तब भी तय किये जायेंगे
विभक्त तब भी होगी वो
तमाम स्नेह-बन्धनों में
लेकिन ये सुकून रहेगा
उसने खुद को खोया नहीं है
विशेषणों के आडम्बर में
धरती होने से इनकार करना
विद्रोह नहीं है उसका
बस एक भरोसा है.........
खुद को दिया हुआ
कि उसका 'स्वत्व 'सुरक्षित है
कि उसने सहेज रखा है
खुद को भी ...............
सब कुछ होते हुए भी
वो एक स्त्री पहले है ........
हर परिभाषा ,दायरे और मानकों से परे

मेरा आदर्श भी वही है राम ..........!


हे राम !
जानते हो तुमसे
क्यों नहीं मांगी 
किसी ने अग्निपरीक्षा.....!!?? 
क्योंकि ये अगाध प्रेम था किसी का 
जो नहीं देख सकता था खड़ा
तुम्हें प्रश्नो के दायरे में 
जो नहीं चाहता था 
खंडित हो तुम्हारी छवि 
मर्यादा पुरुषोतम की 
इतना निश्चल प्रेम 
ईश्वर बना दिया तुम्हें ....!!!!
और ये कैसा प्रेम तुम्हारा 
जिसे थी प्रमाण की दरकार 
दुनिया के लिए.....!!!
ये कैसा ईश्वरत्व तुम्हारा....!!??
जिसे बचाने के लिए 
कर गए परित्याग भी तुम 
हमेशा के लिए ...........
साबित कर दिए दुनिया के इल्ज़ाम 
वह भी तब ........ 
जब सिर्फ तुम्हारी जरूरत थी उसे 
तब कैसे पाओगे  तुम भी वह प्रेम......!!! 
जो तुम्हारा था कभी 
उसे तो जाना ही था ,धरती के गर्भ में 
आज से सदियों पहले ही 
कर गया कोई 
अपनी अस्मिता को बचाने की पहल 
प्रेम में होने के बाद भी ....... 
मेरा आदर्श भी वही है राम 
तुम नहीं .................!!

ओ बिदेसिया.........!



ओ बिदेसिया.........
 तुम्हारी गाथा लिखना चाहती थी
लिखना चाहती थी वह  दर्द
जो सदियों से झेलते आये हो तुम
लिखना था कि चंद रोटियों की खातिर
अपनी मिटटी से दूर होकर कैसे जी पाए तुम
लिख देना चाहती थी.......
 वह सारी अवहेलना
 वह सारी घृणा
 जो तुम्हारी नियति बन गयी है....

जानती हूँ खून उतर आता होगा तुम्हारी आँखों में भी
सुनकर अश्लील उपाधियाँ और वो हिंसक रिश्ता
'भईया' बनाने  का ....
जिसमे प्रेम नहीं नफरत छुपी होती है उनकी
लेकिन तुम्हारे इस असहाय क्रोध को भी चाहिए कुछ आधार
मसलन एक छत जो बचा सके मुसीबतों से
एक भरा हुआ पेट जिसे कल की चिंता न हो
और शायद तुम्हारे अपने ....
जो कहीं दूर  बस इसी आस में टकटकी लगाये रहते हैं कि
 नुक्कड़ की दूकान से आएगा तुम्हारे फ़ोन का बुलावा....

जानती हूँ तुम्हे नींद नहीं आती देशी बोतल या गांजे के बिना
फिर नहीं आते मालिक के सपने
जो खड़ा  होता है छाती पर अपने उधार की रकम के लिए
बबलू भी याद नहीं आता ...
कैसे गोल गोल आँखें मटकाता था
बुधना ने बीडी पीना सीख लिया था...यह भी याद नहीं रहता
न ही याद रहती है मंगली की लौकी की बेल सी चढ़ती उम्र
और उसके हाथ न पीले कर पाने का मलाल
रामपुर वाली की मीठी देह -गंध भी तब नहीं सताती तुम्हे .
यह सब कुछ लिखना चाहती हूँ ..............

लेकिन कैसे लिख पाऊँगी तुम्हारी अंतहीन पीड़ा
मैं भी तो इसी सभ्य समाज का हिस्सा हूँ
जिसकी नज़र में तुम हो जंगली ,जाहिल ,गंवार
हम भला कैसे जानेंगे  तुम्हारा दर्द .......!!!!
तुम्हारी सैकड़ों वर्षों की वह त्रासद कथा
जब भेड़-बकरियों से लादे गए थे तुम जहाजों पर
काले पानी को पार कर कभी नहीं लौटने के लिए
आज भी ठूंसे जाते हो तुम ट्रेन के डब्बों में
यहाँ तक की छतों पर भी
 और कभी कभी यूँ ही कहीं लावारिश पड़े मिलते हो बेजान
 ठेले पर लाद कर भेज दिए जाने के लिए मुर्दा घर....


सोचो तो जरा  बिदेसिया ...................
तुम पैदा ही क्यों किये गए  ......!!??
 सिर्फ हम सफेदपोशों के इस्तेमाल के लिए
ताकि तुम ढो सको हमारा बोझ अपने कन्धों पर
हमारे  भवन ,हमारी  सड़कें ,हमारे  कारखाने
जहाँ मेहनत बोते हो तुम
और फसल काटते हैं हम
और तुम्हे मिलते हैं चंद सिक्के और ढेर सारी घृणा
तुम्हारे पसीने की गंध से उबकाई आती है हमें
भूल जाते हैं  कि इस पसीने के दम पर ही है
 हमारी  दुनिया सुन्दर और आरामदेह....

तुम सब माफ़ कर देते हो बिदेसिया
पता है मुझे .....................
गलियां खाकर , नफरत झेलकर भी
तुम करोगे हमारा ही सजदा
क्योंकि भारी है तुम्हारी रोटियां
 किसी भी और भावना पर  ....

कैसे कह दूं लौट जाओ अपने गाँव
भले ही भूखे मर जाना............
लेकिन कचोटती है तुम्हारी पीड़ा
हमवतन जो हो तुम मेरे
अंतर्मन करता है कई प्रश्न
मैं निरुतर हूँ .......................
चाहती हूँ तुम दो उनका उत्तर
चाहती हूँ तुम  कहो कुछ..........
बताओ कि तुम भी इंसान हो हमारी  तरह
हम ये भूल चुके हैं ..............................
अब तक अपना पसीना बेचा है न तुमने
अब अपने आंसूओं की बोली भी लगाओ
शायद !...मिल जाएँ कुछ अच्छे खरीदार



Wednesday, March 14, 2012

सीमा , तुम्हें सलाम .... !


भोर के अंतिम तारे के आंखे मूंदने से पहले ही
 वह जिंदा कर देती है, आँगन में पड़े अलसाए चूल्हे को
अपनी हड्डियों का ईंधन बनाकर ,उलीचती है ढेर सारा पसीना
तब धधकती है चूल्हे में आग और ठंडी हो पाती है
चार नन्हें मासूमों और दो बूढ़ी ठठरियों के पेट की जलन  ..............

 हमारे सम्पन्न देश के मानचित्र से ओझल
एक फटेहाल गाँव में रहती है सीमा .............
पति के नाम की वैशाखियाँ कभी नहीं पहनी उसने
 नहीं जानती वह सप्तपदी के मंत्रों का अर्थ......
फिर भी परदेश कमाने गए पति की जगह खड़ी है,
बनकर उसके परिवार का आधार.......
बैल की तरह महाजन के खेत में अपना शरीर जोतती
नहीं जानती थकना ,रुकना या रोना .......
जानती है तो बस चलना , बिना रुके , बस चलते रहना.......

हर साल, महाजन की रकम चुकाने आया पति
भले ही नहीं कर पाता काबू ब्याज की जानलेवा अमरबेल को   
लेकिन कर जाता है अपनी मर्दानगी का सुबूत पक्का
  डाल कर उसकी गोद में पीठ से चिपका एक और पेट
तब भी नहीं रुकती सीमा ............
एक दिन के जाये को सास की गोद में लिटा
वह निकल जाती है ,कुछ और रोटियों की तलाश में .......

तेल –साबुन विहीन , चीथरों में लिपटा शरीर ,सूखा चेहरा , रूखे केश
सीमा नहीं जानती शृंगार की भाषा .......
बेमानी है उसके लिए, पेट के अलावा कोई और भूख
लेकिन फिर भी जानती है वह
जब तक गरम गोश्त की महक रहेगी
रात के पिछले पहर बजती रहेगी सांकलें
और वह मुस्कुराएगी छप्पर में खोंसे अपने हँसिये को देखकर ..................

नई रोशनी से दूर , भारी भरकम शब्दों से बने कृत्रिम विमर्शों से दूर
शाम ढले अपने बच्चों को सीने से लिपटाए ,तारों की छाँव में
सुकून की नींद सोती है सीमा ...............
क्योंकि उसे नहीं है भ्रम ,कल का सवेरा लाएगा कोई बड़ा बदलाव
उसे नहीं है इंतज़ार ,एक दिन वह ले पाएगी मुक्ति की सांस
क्योंकि नहीं है उसे बैचनी ,काट दे वह अपने जीवन की बेड़ियाँ ............
वह नहीं जानती समानता के अर्थ, स्वतन्त्रता के मायने .....
इस सारी आपा धापी से परे वह अकेले ही
खींच रही है अपने परिवार की गाड़ी , अपने एक ही पहिये के सहारे ........ !

हमारे सम्पन्न देश के एक फटेहाल गाँव में रह रही सीमा
 अनजाने में ही रच रही है स्त्री- विमर्श की एक सशक्त परिभाषा
बिना बुलंद किए कोई भी नारा , 
बिना थमाए अपने अधिकारों की फेहरिश्त
किसी और के हाथों में......................!
सीमा, तुम्हें मेरा सलाम ......!
क्या तुम दे सकती हो........
 हम तथाकथित स्वतंत्र ,शिक्षित औरतों को
अपनी आधी हिम्मत भी उधार ...............!!??