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Monday, July 02, 2012

बिजूका



देह और मन की सीमाओं में 
नहीं बंधी होती है गरीब की बेटी....
अपने मन की बारहखड़ी पढ़ना उसे आता ही नहीं
और देह उसकी खरीदी जा सकती है
टिकुली ,लाली ,बीस टकिये या एक दोने जलेबियों के बदले भी ....

गरीब की बेटी नहीं पायी जाती
किसी कविता या कहानी में
जब आप उसे खोज रहें होंगे
किताबों के पन्नों में ........
वह खड़ी होगी धान के खेत में,टखने भर पानी के बीच
गोबर में सनी बना रही होगी उपले
या किसी अधेड़ मनचले की अश्लील फब्तियों पर ...
सरेआम उसके श्राद्ध का भात खाने की मुक्त उद्घोषणा करती
खिलखिलाती, अपनी बकरियाँ ले गुजर चुकी होगी वहाँ से .....

आप चाहें तो बुला सकते हैं उसे चोर या बेहया
कि दिनदहाड़े , ठीक आपकी नाक के नीचे से
उखाड़ ले जाती है आलू या शक्करकंद आपके खेत के
कब बांध लिए उसने गेहूं की बोरी में से चार मुट्ठी अपने आँचल में
देख ही नहीं सकी आपकी राजमहिषी भी .....

आपकी नजरों में वह हो सकती है दुश्चरित्र भी
कि उसे खूब आता है मालिक के बेटे की नज़रें पढ़ना भी
बीती रात मिली थी उसकी टूटी चूड़ियाँ गन्ने के खेत में ....
यह बात दीगर है कि ऊँची – ऊँची दीवारों से टकराकर
दम तोड़ देती है आवाज़ें आपके घर की
और बचा सके गरीब की बेटी को
नहीं होती ऐसी कोई चारदिवारी ......

गरीब की बेटी नहीं बन पाती
कभी एक अच्छी माँ
कि उसका बच्चा कभी दम तोड़ता है गिरकर गड्ढे में
कभी सड़क पर पड़ा मिलता है लहूलूहान....
ह्रदयहीन इतनी कि भेज सकती है
अपनी नन्ही सी जान को
किसी भी कारखाने या होटल में
चौबीस घंटे की दिहारी पर .......

अच्छी पत्नी भी नहीं होती गरीब की बेटी
कि नहीं दबी होती मंगलसूत्र के बोझ से....
शुक्र बाज़ार में दस रुपए में
मिल जाता है उसका मंगलसूत्र
उसके बक्से में पड़ी अन्य सभी मालाओं की तरह ....

आप सिखा सकते हैं उसे मायने
बड़े-बड़े शब्दों के
जिनकी आड़ में चलते हैं आपके खेल सारे
लेकिन नहीं सीखेगी वह
कि उसके शब्दकोश में एक ही पन्ना है
जिस पर लिखा है एक ही शब्द
भूख... 
और जिसका मतलब आप नहीं जानते ....

गरीब की बेटी नहीं जीती
बचपन और जवानी
वह जीती है तो सिर्फ बुढ़ापा
जन्म लेती है , बूढ़ी होती है और मर जाती है
इंसान बनने की बात ही कहाँ ..... !
वह नहीं बन पाती एक पूरी औरत भी ....
दरअसल , वह तो आपके खेत में खड़ी एक बिजूका है
जो आजतक यह समझ ही नहीं पायी
कि उसके वहाँ होने का मकसद क्या है ....

Monday, April 30, 2012

वह शिला सी मजबूत औरत ....


घर के जालों को हटाना तो दरअसल एक बहाना होता है
अपने मन पर पड़े जाले हटाना चाहती है
खाली बैठने से डरी हुई,
वह बेवजह ही व्यस्त हो जाती औरत ....

ज़िंदगी की दौड़ में,
हर बार प्रस्थान रेखा से शुरुआत करती,
पूरी कर सके दौड़....
इससे पहले ही रोक दी जाती है, 
 तब भी ,खुद को विजेता का तमगा दिये जाने पर
 वह गीली आँखों से मुसकुराती हुई औरत ....

 छोटी सी ज़िंदगी के अंदर
कई –कई जिंदगियाँ जीती,
हर बार एक नया जन्म लेती है ....
लेकिन किसी भी जन्म में
खुद से कहाँ मिल पाती है....
जीवन को जीते हुए भी  
जीवन से विलग,
वह खुद से ही नाराज़, झुंझलाई सी औरत ....

दायीं आँख फड़कने पर,
 कुछ बेचैन से मंत्र बुदबुदा कर ,
 दूर बसे बच्चों को फोन मिलाती ....
 उनके सँजो कर रखे गए सामानों में उन्हे ढूंढती,   
उम्र से भी ज्यादा चिंताएँ बटोर कर ....
वह असमय ही बूढ़ी हो आई औरत .....

अपने अधिकारों को बखूबी जानती है,
डिग्रियों के पुलिंदे को सहेजा है पूरे जतन से,
फिर भी फेंकी गयी थालियों से अपना हुनर तोलती, 
 ताउम्र अपने वजूद को बचाने की कोशिश में,
वह थक कर कुछ रुक गयी सी औरत ....

कुछ भी हो ....
जब तक जिएगी , वह टूटेगी नहीं,
जीने के बहाने गढ़ती ही रहेगी....
अपने सपनों के घर में,
उम्मीदों के नए रंग सज़ा कर
 फिर अकेली ही उसे निहारेगी,
 वह शिला सी मजबूत औरत ....

Saturday, April 07, 2012

वह कुछ नहीं कहेगी....!!


हथेलियों की लाल- हरी चूड़ियाँ खिसका कर
वह टाँकती है कुछ अक्षर
और दुपट्टे के कोने से पोंछ लेती है
अपनी हदें तोड़ते बेशर्म काजल को ....

माँ के नाम रोज़ ही लिखती है वह चिट्ठियाँ
और दफन कर देती है उसकी सिसकियों को
सन्दूक के अँधेरों में
दम तोड़ने के लिए....

वही सन्दूक जिसे माँ ने
उम्मीदों के सतरंगी रंगों से भरा था
और साथ ही भरी थीं कई दुआएं
बिटिया के खुशहाल जीवन की ....

माँ को अलबत्ता भेजी जाती हैं
कुछ खिलखिलाहटें अक्सर ही
जिसे सुनकर थोड़ा सा और
जी लेती हैं वह ....

मर ही जाएंगी वह
गर जानेंगी कि
उनकी बिटिया के माथे पर चिपकी गोल बिंदी से
 सहमा सूरज
 सदा के लिए भूल गया है
देना अपनी रोशनी ….
 और उसके घर अब चारों पहर
बसता हैं सिर्फ अंधेरा ....

कैसे जी पाएँगी वह
गर जानेंगी कि
उसकी मांग में सजी सिंदूर की  सुर्ख लाल रेखा
बंटी हुई है
कई और रेखाओं में
और झक्क सफ़ेद शर्ट पर
रेंगती आ जाती हैं वह 
उसके बिस्तर तक भी ....

कैसे सुन पाएँगी वह
कि पिछली गर्मियों
जिन नीले निशानों पर
लगाया करती थी
वह ढेर सारा क्न्सीलर
वह किसी के प्रेम की निशानी नहीं थे ....

नहीं , वह कुछ नहीं कहेगी....!!
और शायद कभी खुद भी
दफन कर दी जाएगी
किसी सन्दूक में
हमेशा के लिए ….



Friday, March 23, 2012

यह समय है !


यह समय है,
जब हमारे आस-पास रेंग रहे हैं कई बेखौफ गिरगिट
जो पलक झपकते ही हो जाते हैं हरे या भूरे
खुली आँखें भी देखतीं हैं फिर एक भ्रम
मिट जाता है फर्क असली और नकली का...
 यह समय है,
जब निराशा के ग्रहण
निगल लेते हैं इंसानियत का सूरज
और जो सूरज चमक रहा होता है
 उसे उधार लेनी पड़ती है रौशनी
अँधेरों से...
एक ऐसा समय,
जब निष्पक्षता कर देती है अकेला
और अपना वजूद बनाए रकने के लिए
बनना होता है परजीवी
 किसी और की ऊर्जा का
यह समय नहीं,
जिसे जिया जाये अपनी शर्तों पर...
जहां बह सके आदर्शों की कोई धारा
अपने खुद के ग्लेशियर के सहारे...
यह समय है,
जहां नागफनी की फसल पर लेटी मानवता
कराह रही है
घायल...
लेकिन बेअसर है हरेक मरहम
यह समय है,
 जहाँ कई आवाज़ें
शोर ठहरा दी जातीं हैं
और एक अकेली आवाज
गुम हो जाती है कई आवाज़ों के शोर में...
ऐसे ही एक समय में,
विचलित मन
बो रहा है बीज़
प्रार्थनाओं के...
कल शायद लहलहा सके
एक नए समय के अंकुर,
नयी उम्मीदों,
नए सपनों के साथ...  
प्रेम और मैत्री के साथ...
शांति और सह-अस्तित्व के साथ...
उस दिन एक नया सूरज भी निकलेगा
नयी रौशनी के साथ ...

Thursday, March 15, 2012

जननी भोग्या भी बन सकती है.......!!


दायरों और मापदंडों का इतिहास नया तो नहीं .........................
सदियों से धरती की उपाधि से गर्वित मन
इस सच से अनजान भी नहीं
कि जननी भोग्या भी बन सकती है.......
पुराने मानकों से निवृति पाए बिना
अब नहीं पनप सकता है प्रेम
माना की बोये गए सृजन के बीज
लेकिन इनकार करती है वह धरती होने से ...................
जिस पर किया जा सके स्वामित्व
जिसे काटा जोता और बोया जा सके
जिसे ख़रीदा और बेचा जा सके
जिसे रौंदा जा सके निर्मम पद प्रहारों से
और फसल नहीं आये तो
चस्पा कर दिया जाए
बंजर का तमगा ........
दायरे तब भी रहेंगे
मापदंड तब भी तय किये जायेंगे
विभक्त तब भी होगी वो
तमाम स्नेह-बन्धनों में
लेकिन ये सुकून रहेगा
उसने खुद को खोया नहीं है
विशेषणों के आडम्बर में
धरती होने से इनकार करना
विद्रोह नहीं है उसका
बस एक भरोसा है.........
खुद को दिया हुआ
कि उसका 'स्वत्व 'सुरक्षित है
कि उसने सहेज रखा है
खुद को भी ...............
सब कुछ होते हुए भी
वो एक स्त्री पहले है ........
हर परिभाषा ,दायरे और मानकों से परे

मेरा आदर्श भी वही है राम ..........!


हे राम !
जानते हो तुमसे
क्यों नहीं मांगी 
किसी ने अग्निपरीक्षा.....!!?? 
क्योंकि ये अगाध प्रेम था किसी का 
जो नहीं देख सकता था खड़ा
तुम्हें प्रश्नो के दायरे में 
जो नहीं चाहता था 
खंडित हो तुम्हारी छवि 
मर्यादा पुरुषोतम की 
इतना निश्चल प्रेम 
ईश्वर बना दिया तुम्हें ....!!!!
और ये कैसा प्रेम तुम्हारा 
जिसे थी प्रमाण की दरकार 
दुनिया के लिए.....!!!
ये कैसा ईश्वरत्व तुम्हारा....!!??
जिसे बचाने के लिए 
कर गए परित्याग भी तुम 
हमेशा के लिए ...........
साबित कर दिए दुनिया के इल्ज़ाम 
वह भी तब ........ 
जब सिर्फ तुम्हारी जरूरत थी उसे 
तब कैसे पाओगे  तुम भी वह प्रेम......!!! 
जो तुम्हारा था कभी 
उसे तो जाना ही था ,धरती के गर्भ में 
आज से सदियों पहले ही 
कर गया कोई 
अपनी अस्मिता को बचाने की पहल 
प्रेम में होने के बाद भी ....... 
मेरा आदर्श भी वही है राम 
तुम नहीं .................!!

ओ बिदेसिया.........!



ओ बिदेसिया.........
 तुम्हारी गाथा लिखना चाहती थी
लिखना चाहती थी वह  दर्द
जो सदियों से झेलते आये हो तुम
लिखना था कि चंद रोटियों की खातिर
अपनी मिटटी से दूर होकर कैसे जी पाए तुम
लिख देना चाहती थी.......
 वह सारी अवहेलना
 वह सारी घृणा
 जो तुम्हारी नियति बन गयी है....

जानती हूँ खून उतर आता होगा तुम्हारी आँखों में भी
सुनकर अश्लील उपाधियाँ और वो हिंसक रिश्ता
'भईया' बनाने  का ....
जिसमे प्रेम नहीं नफरत छुपी होती है उनकी
लेकिन तुम्हारे इस असहाय क्रोध को भी चाहिए कुछ आधार
मसलन एक छत जो बचा सके मुसीबतों से
एक भरा हुआ पेट जिसे कल की चिंता न हो
और शायद तुम्हारे अपने ....
जो कहीं दूर  बस इसी आस में टकटकी लगाये रहते हैं कि
 नुक्कड़ की दूकान से आएगा तुम्हारे फ़ोन का बुलावा....

जानती हूँ तुम्हे नींद नहीं आती देशी बोतल या गांजे के बिना
फिर नहीं आते मालिक के सपने
जो खड़ा  होता है छाती पर अपने उधार की रकम के लिए
बबलू भी याद नहीं आता ...
कैसे गोल गोल आँखें मटकाता था
बुधना ने बीडी पीना सीख लिया था...यह भी याद नहीं रहता
न ही याद रहती है मंगली की लौकी की बेल सी चढ़ती उम्र
और उसके हाथ न पीले कर पाने का मलाल
रामपुर वाली की मीठी देह -गंध भी तब नहीं सताती तुम्हे .
यह सब कुछ लिखना चाहती हूँ ..............

लेकिन कैसे लिख पाऊँगी तुम्हारी अंतहीन पीड़ा
मैं भी तो इसी सभ्य समाज का हिस्सा हूँ
जिसकी नज़र में तुम हो जंगली ,जाहिल ,गंवार
हम भला कैसे जानेंगे  तुम्हारा दर्द .......!!!!
तुम्हारी सैकड़ों वर्षों की वह त्रासद कथा
जब भेड़-बकरियों से लादे गए थे तुम जहाजों पर
काले पानी को पार कर कभी नहीं लौटने के लिए
आज भी ठूंसे जाते हो तुम ट्रेन के डब्बों में
यहाँ तक की छतों पर भी
 और कभी कभी यूँ ही कहीं लावारिश पड़े मिलते हो बेजान
 ठेले पर लाद कर भेज दिए जाने के लिए मुर्दा घर....


सोचो तो जरा  बिदेसिया ...................
तुम पैदा ही क्यों किये गए  ......!!??
 सिर्फ हम सफेदपोशों के इस्तेमाल के लिए
ताकि तुम ढो सको हमारा बोझ अपने कन्धों पर
हमारे  भवन ,हमारी  सड़कें ,हमारे  कारखाने
जहाँ मेहनत बोते हो तुम
और फसल काटते हैं हम
और तुम्हे मिलते हैं चंद सिक्के और ढेर सारी घृणा
तुम्हारे पसीने की गंध से उबकाई आती है हमें
भूल जाते हैं  कि इस पसीने के दम पर ही है
 हमारी  दुनिया सुन्दर और आरामदेह....

तुम सब माफ़ कर देते हो बिदेसिया
पता है मुझे .....................
गलियां खाकर , नफरत झेलकर भी
तुम करोगे हमारा ही सजदा
क्योंकि भारी है तुम्हारी रोटियां
 किसी भी और भावना पर  ....

कैसे कह दूं लौट जाओ अपने गाँव
भले ही भूखे मर जाना............
लेकिन कचोटती है तुम्हारी पीड़ा
हमवतन जो हो तुम मेरे
अंतर्मन करता है कई प्रश्न
मैं निरुतर हूँ .......................
चाहती हूँ तुम दो उनका उत्तर
चाहती हूँ तुम  कहो कुछ..........
बताओ कि तुम भी इंसान हो हमारी  तरह
हम ये भूल चुके हैं ..............................
अब तक अपना पसीना बेचा है न तुमने
अब अपने आंसूओं की बोली भी लगाओ
शायद !...मिल जाएँ कुछ अच्छे खरीदार



Wednesday, March 14, 2012

सीमा , तुम्हें सलाम .... !


भोर के अंतिम तारे के आंखे मूंदने से पहले ही
 वह जिंदा कर देती है, आँगन में पड़े अलसाए चूल्हे को
अपनी हड्डियों का ईंधन बनाकर ,उलीचती है ढेर सारा पसीना
तब धधकती है चूल्हे में आग और ठंडी हो पाती है
चार नन्हें मासूमों और दो बूढ़ी ठठरियों के पेट की जलन  ..............

 हमारे सम्पन्न देश के मानचित्र से ओझल
एक फटेहाल गाँव में रहती है सीमा .............
पति के नाम की वैशाखियाँ कभी नहीं पहनी उसने
 नहीं जानती वह सप्तपदी के मंत्रों का अर्थ......
फिर भी परदेश कमाने गए पति की जगह खड़ी है,
बनकर उसके परिवार का आधार.......
बैल की तरह महाजन के खेत में अपना शरीर जोतती
नहीं जानती थकना ,रुकना या रोना .......
जानती है तो बस चलना , बिना रुके , बस चलते रहना.......

हर साल, महाजन की रकम चुकाने आया पति
भले ही नहीं कर पाता काबू ब्याज की जानलेवा अमरबेल को   
लेकिन कर जाता है अपनी मर्दानगी का सुबूत पक्का
  डाल कर उसकी गोद में पीठ से चिपका एक और पेट
तब भी नहीं रुकती सीमा ............
एक दिन के जाये को सास की गोद में लिटा
वह निकल जाती है ,कुछ और रोटियों की तलाश में .......

तेल –साबुन विहीन , चीथरों में लिपटा शरीर ,सूखा चेहरा , रूखे केश
सीमा नहीं जानती शृंगार की भाषा .......
बेमानी है उसके लिए, पेट के अलावा कोई और भूख
लेकिन फिर भी जानती है वह
जब तक गरम गोश्त की महक रहेगी
रात के पिछले पहर बजती रहेगी सांकलें
और वह मुस्कुराएगी छप्पर में खोंसे अपने हँसिये को देखकर ..................

नई रोशनी से दूर , भारी भरकम शब्दों से बने कृत्रिम विमर्शों से दूर
शाम ढले अपने बच्चों को सीने से लिपटाए ,तारों की छाँव में
सुकून की नींद सोती है सीमा ...............
क्योंकि उसे नहीं है भ्रम ,कल का सवेरा लाएगा कोई बड़ा बदलाव
उसे नहीं है इंतज़ार ,एक दिन वह ले पाएगी मुक्ति की सांस
क्योंकि नहीं है उसे बैचनी ,काट दे वह अपने जीवन की बेड़ियाँ ............
वह नहीं जानती समानता के अर्थ, स्वतन्त्रता के मायने .....
इस सारी आपा धापी से परे वह अकेले ही
खींच रही है अपने परिवार की गाड़ी , अपने एक ही पहिये के सहारे ........ !

हमारे सम्पन्न देश के एक फटेहाल गाँव में रह रही सीमा
 अनजाने में ही रच रही है स्त्री- विमर्श की एक सशक्त परिभाषा
बिना बुलंद किए कोई भी नारा , 
बिना थमाए अपने अधिकारों की फेहरिश्त
किसी और के हाथों में......................!
सीमा, तुम्हें मेरा सलाम ......!
क्या तुम दे सकती हो........
 हम तथाकथित स्वतंत्र ,शिक्षित औरतों को
अपनी आधी हिम्मत भी उधार ...............!!??

Sunday, March 04, 2012

हाँ ,इसे प्रेम ही कहेंगे शायद ..............

 हाँ ,इसे प्रेम ही कहेंगे शायद ..............
 कि हमारे बीच अब नहीं है जरुरत शब्दों के उस सेतू की
जिस पर चलकर ही कभी हम पहुँच पाते थे एक -दुसरे तक .....

आँखों के किनारों से टकराती हैं मौन की आतुर लहरें 
जिसमे निर्बंध तैरते रहते हैं हम  
साथ -साथ लेकिन फिर भी अलग .....
यह  अच्छी तरह जानते हुए कि डूबेंगे नहीं 
बिना एक दूसरे को लाइफ जैकेट की तरह पहने हुए भी .........

हाँ , यह प्रेम ही तो है .............................
 कि यह जानते हुए भी कि धीरे -धीरे समय की आंच पर सुलग रहे हैं रिश्ते 
और  घुल रहा है हवा में कार्बन मोनो आक्साईड
जो मुश्किल करता है सांस लेना भी 
हम सँजोये रखते हैं ताज़ी हवा की उम्मीद 
और बनाते रहते हैं  नयी खिड़कियाँ दीवारों में ....................
ताकि शीतल हवा के झोंके कम कर सकें जलन की तासीर 
और मिल सके घुटन से  निजात...............

इसे प्रेम नहीं तो और क्या कहेंगे ....................
कि रोज़ टूटते सपनों की किरचों पर चल कर होते हैं लहूलूहान 
 फिर भी खरीद लाते हैं अक्सर एक नया  झिलमिलाता सपना  
 और संभाल कर रख देते हैं शो -केस में
यह जानते हुए भी कि उसे भी टूट जाना है एक दिन 
यूँ ही ,कभी हमारी ही लापरवाही से ........
या फिर खो देनी  है अपनी रंगीनियत
 धूल की रोज़ ही चढ़ती मोटी परत के नीचे............ 
उसे चमकाते रहने की तमाम कवायदों के बाद भी ..............

सच कहा तुमने ,यह प्रेम ही होगा ..........
कि जानते हैं, मुश्किल है साथ चलना 
हम चलते रहते हैं समानांतर 
एक ही सड़क पर ................
बिना हाथों में हाथ डाले 
क्योंकि हमारा इंतज़ार करती जिन्दगी की ब्लू लाइन बस ने 
हमारा स्टॉप एक ही रखा है..............
और एक ही मंजिल भी ..............
और वो भी हमारे मशवरे पर ही .......
..............................................!
किसने कहा ,प्रेम आँखों में आँखें डाले 
 हाथ थामे ,साथ चलने का नाम है ...........!
आसमां नीला है और घास हरी 
प्रेम इस उम्मीद के जिन्दा रहने का नाम है 
हर उम्मीद के टूटते चले जाने के बाद भी ................!!






Thursday, March 01, 2012

सिल्क स्मिता के बहाने !


बहुत देर से देखी डर्टी पिक्चर . वजह बिलकुल साफ़ थी इसका डर्टी होना , बस मौका तलाश रही थी कि कभी बिटिया नहीं हो आस -पास तो देखूं . कई सवाल छोड़ दिए इस फिल्म ने जेहन में . क्या गुनाह है, अगर किसी स्त्री ने खुद संभाल ली अपनी देह की बागडोर ! क्यों इतना हंगामा अगर उसने खुद लिए अपनी देह से जुड़े फैसले ! अगर यही फैसले एक पुरुष लेता है ,जो कि लेता भी आया है सदियों से , तो किसी को कोई तकलीफ नहीं होती , क्योंकि स्त्री की आत्मा की तरह ही उसके शरीर पर भी उसका कोई अधिकार नहीं . पुरुष की मर्ज़ी उसे जैसे चाहे उपभोग करे , स्त्री को सिर्फ उसके आनंद का , उसकी मर्ज़ी का ख्याल रखना है . वह हाड- मांस की बनी हुई इंसान नहीं एक कठपुतली है समाज के लिए जिसको नियंत्रित करने के धागे हमेशा ही समाज के , उसके कर्ता- धर्ता , उसके ' स्वामी ' के हाथ में रहते हैं . इस फिल्म की एक पात्र है ' नायला ' ,जो एक गॉसिप पत्रिका की जर्नलिस्ट है , वह कहती है ;" हमेशा से पुरुषों को देवता बनाने के लिए औरतों को शैतान बनाना ही पड़ता है ". यह एक टिप्पणी बहुत कुछ कह जाती है औरतों के भूत ,वर्तमान और भविष्य के बारे में . इतिहास गवाह है कि अपने फैसलों को जायज ठहराने के लिए हमारे समाज ने सदा से एक औरत को ही शैतान बनाया है , मंथरा , कैकई से लेकर द्रौपदी तक की गाथाएँ चीख -चीख कर पूछती हैं कि क्या अपने फैसलों का बोझ खुद उठाने की हिम्मत नहीं थी , या किसी स्त्री की छाती पर पैर रखकर ही महानता का तमगा लेना था ! सिल्क सरीखे जिस्म भी समाज ही बनता है ,उसे चाहिए ऐसी गठी हुई देह अपने मनोरंजन के लिए और उस पर मज़े की बात यह कि उस देह की कमान भी वह अपने हाथ में ही रखना चाहता है . सिल्क चुभने लगी उस समाज को जो  औरतों को  उड़ते हुए देखने का आदी नहीं थी , जिसके लिए पत्नी , प्रेमिका और रखैल के अलग -अलग मापदंड तय है और जिनसे इंच मात्र हिलने की उम्मीद वह औरतों से नहीं करता. सिल्क ने गलती कर दी ,उसने अपनी देह अपनी मान ली . फिर कैसे जीने देता उसे यह समाज चैन से ! हो सकता है सिल्क का रास्ता गलत हो, लेकिन कौन तय करेगा इसके मापदंड , कितना क्या गलत है, किसके लिए ,किसने लिखे यह नियम ! जवाब शायद पता हैं आप को . पुरूषों की बनायीं इस दुनिया में स्त्री के लिए बहुत कुछ गलत है ,जो उनके खुद के लिए उनका पुरुषत्व है ,उनकी मर्दानगी का सुबूत . फिल्म का हीरो सिल्क से पहले ५०० लड़कियों के साथ' टयूनिंग ' कर चूका होता है ,लेकिन वह गलत नहीं . और माफ़ करेंगे ऐसा सिर्फ फिल्मों में नहीं होता , फ़िल्में तो थोड़े मसाले के साथ हमारे आस -पास का सच ही दिखाती हैं .पाप पुण्य का हिसाब बाद में कर लेंगे ,समाज पर पड़ने वाले प्रभाव की परताल भी ,अभी बस यही सवाल बैचैन करता है ,क्यों इतना मुश्किल है एक स्त्री के लिए अपनी शर्तों पर जीना ! सिल्क से लेकर परवीन बौबी तक , राखी सावंत से लेकर पूनम पाण्डेय तक और गली में आने वाली उस धोबन तक,( जो अपने शराबी पति को छोड़ आई है लेकिन खुश है, सजती सम्बरती है ),जिसने भी जीना चाहा है अपनी जीवन अपनी शर्तों पर ,उसके लिए इतनी हेय दृष्टि क्यों है समाज की ! क्यों दिया जाता है उसे एक बुरी ,बिगड़ी हुई औरत का दर्ज़ा ? इस समाज के वह सारे  नियम तब कहाँ चले जाते है, जब एक पुरुष की बारी आती है ,समाज चुप रहता है ,उसकी गलतियों पर  , दबे स्वर में शिकायत करता भी है तो यह जोड़ता है साथ में : अरे ,मर्द की जात ही ऐसी होती है , और लो मिल गया लाइसेंस हर गलती का , हर हदें तोड़ने का . वैसे भी समाज का पालनहार , समाज का रक्षक पुरुष ही है तो अपने ही अस्तित्व पर वह क्यों लगाने लगा प्रश्न चिह्न ! अपने खुद के लिखे नियमों की वह क्यों करने लगा खिलाफत !. सीधी सी बात है हजारों- लाखों साल बाद भी जहाँ औरतों का सवाल आता है ,कुछ नहीं बदला बल्कि स्थिति बदतर होती गयी है . औरतों ने जीने की मुहिम छेड़ दी है बिना यह ठीक से परखे कि समाज तो आज भी उसे आले या दीवार पर सजी देवी प्रतिमा की तरह ही देखना चाहता है , जीती -जागती देवी , जिसे जब चाहे वह रौंद दे लेकिन जिसके पास उफ़ तक करने की भी जुबान नहीं हो , फिर वह कैसे झेल पायेगा हाड -मांस की उस औरत को जो अपनी कामना को जुबान देने लगी हो ,अपनी ख्वाहिशें जीने लगी हो . हमारी सभ्यता -संस्कृति को जिन्दा रखने ,उसकी गरिमा को बचाए रखने का सारा दारोमदार बड़ी ही चालाकी से औरतों के कंधे पर डाल दिया गया है इसलिए पुरुष खुद चाहें तो संसद में बैठकर पोर्न देखे ,और हर लड़की के शरीर का एक्स रे कपड़ों के अन्दर से भी लेते रहें , एक पूनम पाण्डेय  ने थोड़े कपडे क्या उतार दिए इनकी शेषनाग के फन पर टिकी कालजयी संस्कृति अब गिरी कि तब गिरी वाली हालत में आ जाती है . अब तो शर्म करो थोडा . सच को कबूलने की हिम्मत लाओ . बहुत बुरी है सिल्क , मल्लिका , पूनम फिर क्यों हिट हैं ये , इसलिए कि तुम्हे इन्हें देखना अच्छा लगता है , अगर यह नहीं दिखाए तो तुम ऐसे हालत पैदा कर ही लोगे ,संस्कृति के ठेकेदारों कि तुम्हारा आनंद का कोटा बदस्तूर चलता रहे . तो बस सीधा सा हिसाब है ,सभी फैसले तुम्हारे ही थे ,जिए तुमने , अब उन्हें भी जीने दो जैसे वह जीना चाहती हैं .उनका जीवन है और उन्हें बेहतर पता है अपना भला -बुरा .वह भी इंसान है और उन्हे भी हक़ है अपने जीवन से जुड़े निर्णय लेने का . समाज की मेंटल कन्डीशनिंग की इंतेहा तो तब हो जाती है जब औरतें खुद जायज ठहराती है, अपने पैरों की बेड़ियों को . एक मित्र जो बहुत ही धार्मिक और घरेलू महिला हैं , समाज के बनाए दायरों में रहने वाली एक अच्छी औरत’, ने सिल्क सरीखों की चर्चा चलने पर कहा  ; “अरे ऐसी औरतें कलंक हैं हमारे समाज पर . मर्द बिचारे भी क्या करें , कब तक बचाएं खुद को . ऐसी औरतों की यही नियति होती है ". मैं एक ठंडी सांस लेकर उन्हे देखती हूँ . जो जिया आज तक ,जो सिखाया गया जन्म से वही तो कह रही हैं , गलत क्या कहा . “ज़ोर से मत हंसो , आराम से चलो , दुपट्टा ठीक से रखो ,पति का घर ही सब कुछ , रसोई की दक्षता सर्वप्रथम है , ऑलराउंडर बनो , पेंटिंग ,सिलाई ,घर सजाने से लेकर गणित के सवालों तक , शाम में दोस्त के घर पार्टी ,भाई साथ जाएगा , दोस्तों के साथ फिल्म ,भले घर की लड़कियां नहीं जाती ,लोग क्या कहेंगे ”, लंबी सूची है , लेकिन हर लड़की गुजरती है इन हिदायतों से ,कभी घर वाले ,कभी आस –परोस , उन्हे बाध्य करते हैं , समझाते  हैं कि देखो यही रास्ता है , नाक की सीध पर चलती रहो ,बिना सवाल उठाए , और  जिन्होने भी रास्ता बदला , उनकी स्थिति या यूं कहें कि दुर्गति वही होती है जो सिल्क की हुई . आज भी आए दिन अखबारों में पढ़ती ही रहती हूँ ,फलां मॉडेल ने आत्म- हत्या कर ली, फलां किशोरी ने खुद को फांसी चढ़ा लिया वगैरह . सिल्क तो 80 के दशक की थी ,आज 21वीं सदी में भी कुछ नहीं बदला . कामसूत्र और खजुराहो के इस देश में आज भी सेक्स शब्द पर बात करना गुनाह है , खासकर महिलाओं का , उन्होने यह लक्ष्मण रेखा पार की नहीं कि उन्हे आज भी बुरी लड़कियों कि फ़ेहरिश्त में डाल दिया जाता है . समझ से परे है यह मानसिकता , सदियों से नगरवधू रखने की परंपरा वाला यह देश , एक पूरी कॉलोनी रेडलाइट एरिया के नाम से बसाने वाला यह देश क्यों नहीं हजम कर पाता सिल्क को या राखी सावंत को जो माद्दा रखती है खुलकर अपने शरीर पर बोलने का , जिन्हे पता है अपने शरीर की कीमत और उसे कैश करने के सारे हुनर भी बखूबी आते हैं उन्हे . बहुत बुरी हैं ये औरतें , चलिये मान लिया , हमारी आदर्श संस्कृति पर धब्बा , तो बंद कर दीजिये इनकी दूकानें. जीने का हक़ छीनने से अच्छा है ,  जीवन नारकीय बनाने  से अच्छा है ,इन्हे पैदा ही मत होने दीजिये . मत देखिये इन्हे , चोरी छुपे भी , मत आहें भरिए अकेले में भी . खुद ही खत्म हो जाएंगी ये बुरी औरतें जो बिगाड़ रही हैं आपको , आपकी सभ्यता , आपकी हजारों वर्षों पुरानी कालजयी संस्कृति को .... !! आपने सैद्धान्तिक तौर पर तो इन्हे देवी बनाए रखा और अंदर ही अंदर इन्हे सिर्फ एक शरीर समझा जो हर  तरह से आपका बोझ उठाती रही सदियों से . अब कुछ चालाक औरतों ने ,जिन्हे समझ में आ गया आपका यह षड्यंत्र और इंकार कर दिया देवी बनने से और खुल कर संभाल ली अपनी देह की कमान तो इतना हँगामा क्यों ...... !! निर्णय लीजिये पहले खुल कर , निकालिए खुद को दुविधा से कि आपको देवी चाहिए या शरीर , या अलग – अलग खांचे ही बनाए रखेंगे आप , सुविधानुसार इस्तेमाल करते रहने के लिए .......... और अपनी दुर्बलता का ठीकरा फोड़ते रहेंगे  इन बुरी औरतों” के सर ही . मुझे पता है मेरा यह लिखना भी आपको फूटी आँख नहीं भाएगा , मैं भी तो औरत हूँ न और आपके हिसाब से आज मैंने भी कर लिया अपनी सीमा का अतिक्रमण , तो बस पिल पड़िए मुझ पर , राखी , सिल्क , ममता शर्मा  या खुशबू पर , और याद दिला दीजिये सबको कि हमारे इस देश में शरीर पर बात करने का हक़ सिर्फ आपका है , सिर्फ आपका ........ और हवा में उछालने शुरू कर दीजिये सभ्यता , संस्कृति , परंपरा , मर्यादा , नैतिकता जैसे बड़े – बड़े शब्द जो आपने गढ़े ही हैं औरतों को नियंत्रण में रखने के लिए ........ 

स्त्रियाँ बिगड़ गयी हैं आजकल ........!!




 स्त्रियाँ बिगड़ गयी हैं आजकल
लांघ रही हैं वर्जनाएँ  
जो कभी अधिकार क्षेत्र था
सिर्फ आपका  जनाब ......

तो क्यों न हो आपको चिंता .....!!
आखिर सवाल है 
हजारों वर्षों पुरानी संस्कृति का .....
यूँ उसे बर्बाद होते 
कैसे देख सकते हैं  आप .......!!

बाहर जाने की आज़ादी दे दी ....
नहीं रोका 
अपने पैरों पर खड़ा होने से.......... 
तो क्या हो जायेंगी इतनी उन्मुक्त ....!! 
 ढालने लगेंगी अपना जीवन
अपनी ही मर्ज़ी से ............!!
आपकी बराबरी करेंगी ....!!!

प्रेम की तो क्या बिसात 
करती हैं यह 
अब अलगाव  तक की बातें ......... !!
कसैला हो  गया है  मन आपका
सुनकर कडवे प्रतिउत्तर 
कहाँ गयी वह मिठास ...!!
कहाँ गयी वह आदर्श नारियां ........ 
जीती थी जो लेकर 
आँचल में दूध 
आँखों में पानी .....!!!

इनके विचारों की तरह ही 
स्वतंत्र हो गए हैं 
इनके पहनावे भी ...... 
घूमती हैं निडर अकेले 
उकसाती हैं बेचारे पुरुषों को ......
तभी तो होते हैं बलात्कार ..... !!

अरे..... घोर कलियुग आ गया है...
 स्वाभाविक है आपकी चिंता जनाब ....
 यह तो खतरा है...
चुनौती है....  
आपके साम्राज्य ....
आपके परिवार 
आपके समाज पर..... 
जहाँ वर्षों से 
विराजमान हैं  आप 
सर्वोच्च सिहांसन पर 
अविजित............

अब पछताने से 
फायदा भी क्या ........
जब आपने कर ही दी 
इनकी लगाम ढीली...... 
देखो इनकी बेशर्मी...... !!
सारी रस्सियाँ  ही खोल बैठी हैं.....
 घूम रही हैं स्वछंद 
बिना लगाम के ......
और जी रही हैं 
अपनी चाहतें .....

आह .....!
तभी तो आप 
दुहरा ही लेते हो 
पंक्तियाँ अपने पूर्वजों की ..... 
कितना रटाया था उन्होंने 
"ढोल ,गंवार  शुद्र  पशु नारी 
ये सब  हैं तारण के अधिकारी "
यह भी तो याद कर लेते 
कम से कम .........
"नहीं देनी चाहिए 
स्वतंत्रता स्त्री को 
किसी भी उम्र में "................
कहा था उस पितामह ने 
जो खुद नहीं दे पाया सुरक्षा 
द्रौपदी को 
कर्तव्यों की आड़ में ......

नहीं ................
कुछ भी तो  याद नहीं 
रख पाए आप ..........
 दे ही डाली  ....
इन्हें स्वतंत्रता ........!!

अब कुछ नहीं हो सकता जनाब ......
गयी अब आपकी सभ्यता -संस्कृति ....!!
और गया आपका सुशासन ......!!
स्त्रियाँ बिगड़ गयी हैं आजकल ........!!
जीने लगी  हैं अब वह ..........
अपनी ख्वाहिशें .........
तय करने लगी हैं
अपना भला बुरा 
खुद ही ........ !!
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