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Sunday, February 26, 2012

मैं नहीं कर पाती तुम्हें प्रेम ..... !!


मैं नहीं कर पाती तुम्हे प्रेम ............!
 जब भी चाहती हूँ ,भूल कर सब कुछ 
 तुम्हे ,सिर्फ तुम्हे याद रख सकूँ 
मेरे आस पास की दीवारों में 
खुल जाती है कई खिड़कियाँ...... ....
और उनसे छनकर आते हैं अन्दर 
ढेर सारी नीली रोशनियों के टुकड़े.....
  
उन टुकड़ों में मुझे 
सिर्फ तुम्हारा चेहरा ही नहीं दिखता .....
दिखता है अपना वजूद भी 
जो उन टुकड़ों के साथ ही 
अलग -अलग तैर रहा होता है 
विभक्त ..........!
और मैं गुम हो जाती हूँ 
इन सबके समीकरण जोड़ने में ही .....

तुम्हे प्रेम करते हुए 
जब भूल जाना चाहिए मुझे खुद को 
मुझे और भी शिद्दत से याद आता है 
मेरा होना ............!!

तुम्हे प्रेम करते हुए मैं भूल जाना चाहती हूँ 
शरीर की भाषाएँ और सुनना चाहती हूँ 
अगर होता है कुछ  इसके परे भी........!!
लेकिन हर बार मैं रह जाती हूँ मात्र एक शरीर 
 जो नहीं पहुँच पाता तुम्हारी आत्मा तक .......

प्रेम जोड़ -तोड़ , गुना , भाग के
गणितीय सूत्रों से परे की है चीज़ कोई 
खुद को यह याद दिला कर ........
 कोशिश करती हूँ कि डूब जाऊं तुम्हारे प्रेम में 
 लेकिन पाती  हूँ , 
पानी तो इतना गहरा ही नहीं .......
जो  मुझे डुबो सके ............!!

 उलझ जाती हूँ ,फिर इसी जद्दो-जेहद में .......
और नहीं कर पाती मैं तुम्हें प्रेम 
 शायद मैं कर ही नहीं सकती.....
एक निर्दोष प्रेम ..........!!



Saturday, February 18, 2012

तुम नहीं हो यहाँ.....!!


बाहर बढ़ता जाता है
शोर जितना
मेरे अन्दर गहराता है
उतना ही सन्नाटा.......

आँखें बंद कर लेने पर भी
अट्टहास करते
रौशनी के समंदर की लहरें
चुभती रहती हैं आँखों में
किरचों की तरह........

रौशनी का यह समंदर
शीतलता, ऊर्जा,
या जीवन नहीं देता ....
देता है तो एक अंतहीन प्यास
और अपनी लघुता का एहसास ....


इस रौशनी में
रेंगते सभी साए
झूठ हो या न हो ......
उनके चेहरों की
अबूझ लकीरों को पढना
मुझे नहीं आता .. ....
और इनके इर्दगिर्द जिए जाना भी
उन्हें और खुद को भी
छलने जैसा ही है .....


यह जानकर भी
कि नहीं है निश्चित
तुम्हारा होना भी .....
शायद यह एक छलावा ही था मेरा
खुद को दिया हुआ .....
मैं खुद से कहती रही
हर बार .....

तुम हो यहाँ .....

लेकिन जब भी तुम्हे पुकारा
तुम सुन नहीं सके.....
क्योंकि तुम थे ही नहीं
थे तो बस
रौशनी के कुछ अबूझ टुकड़े...
 और कुछ चेहरे....
जिन पर लिखी इबारत
मुझे पढने नहीं आती
और कुछ शब्द
जिसके मायने
समझ नहीं पायी आजतक
नहीं......
तुम नहीं हो यहाँ ...
कभी नहीं थे ...
तुम्हारे होने का
एक भ्रम था बस ....!!







Thursday, February 16, 2012

मुझे सूरजमुखी उगाने हैं ......



सोचा था 
अब घेर लूंगी मैं 
अपने चारों ओर 
कुछ कंटीले तार 
मुझे सूरजमुखी उगाने हैं 
इस बार ..  
किसी ने बताया मुझे 
कंटीले तार लगे हों
तो नहीं होता खतरा जानवरों का ....
उनका भी नहीं 
जो अपने आनंद के लिए 
जुदा कर देते हैं फूलों को 
उनकी डाल  से..... 
आज तक सोचती थी 
बस धूप हवा ओर पानी ही तो चाहिए
फूलों को खिलखिलाने के लिए .....
लेकिन हैरानी हुई 
यह जान कर  
इन सबसे ज्यादा जरुरी हैं
कांटे .............!!!!
डरती थी लेकिन
 ये कंटीले तार 
कहीं मेरे फूलों को न चुभ जाएँ 
कहीं छीन न लें 
उनकी हंसी ......
एक सवाल भी
 लौट आता था
 बार बार 
सोचा 
पूछूंगी माली  से .......
क्या इस बार 
अच्छी खेप  आएगी
फूलों की.................!!!??
 लेकिन पता था 
मुझे उसका उत्तर भी... 
माली है न .......
वह तो हिमायत ही करेगा
 काँटों की .
फूलों के लहलहाने में ही तो 
छुपा है उसका भविष्य
लेकिन कोई नहीं चाहता 
 यह जानना  
क्या चाहते है फूल ....!!??
क्या उन्हें रहना है 
काँटों के घेरे में......!!??
क्या उन्हें पसंद है जीना  
 अपनी  सारी उम्र 
पहरे में ही ........
एक दिन बेरहमी से 
तोड़ लिए जाने के लिए ......!!
मैं जानती हूँ 
फूलों की ख्वाहिश 
वह चाहते हैं 
मैं बंद कर दूं 
 अपने अंधेरों को
 कंटीले तारों में ......
उन्हें तो बस 
 चमकता हुआ सूरज चाहिए ......




Sunday, February 12, 2012

क्यों अनचीन्हा सा लगता है ये वक्त........ प्यार के इस मौसम की तरह...



प्यार का यह मौसम गुजर जाने के बाद 
मैं तलाशूंगी तुम्हारा चेहरा 
कुछ सूखे फूलों में, 
कुछ संभाल कर रखे गए ग्रीटिंग कार्ड्स में.
उन लम्हों की धूल हटाकर 
खोजूंगी तुम्हे वहां भी  ....
जिन पर लिखे थे 
कुछ सपने 
तुम्हारे नाम के साथ .....

उस गुलाबी  डायरी के
पीले पड़ आये पन्नों के  
 दिल  पर भी
 उकेरे थे कुछ शब्द....
जो कभी जिए नहीं जा सके
तुम्हारे संग 
एक उम्र जी लेने के बाद भी...... .
और जिन्हें जीने की हसरतें भी 
अब मरती जा रहीं हैं.....

अपनी उँगलियों की तपिश से 
 फिर एक बार .....
 जिन्दा करना चाहूंगी उन्हें ....

समझना है मुझे इस बार 
क्यों बाहर के मौसम के साथ 
बदल जाता है
 अन्दर का मौसम भी.... 
क्यों ठिठक जाती है धूप
कितनी बर्फ जमा हो जाती है 
जो निकलती ही रहती है
 पिघलकर 
ताउम्र 
आँखों के रास्ते ..........

क्यों यह भीड़  अब भी
याद दिलाती रहती है 
सिर्फ तुम्हारा चेहरा.... 
और क्यों हर वो चीज़ 
अब भी........ 
 हो जाती है मेरे करीब 
जो गुजरती है तुम्हे छू कर ....

समझना है मुझे 
क्यों नहीं लिख पायी आज तक 
मैं तुमपर कविता .......
 जबकि तुम्हे  ही तो होना था 
मेरी कविता का पर्याय.........

क्यों अनचीन्हा सा लगता है ये वक्त 
प्यार के इस मौसम की तरह...... .
और क्यों साथ होने पर भी 
 रहता है 
तुम्हारा इंतज़ार ....... 
प्यार का  यह मौसम 
गुजर जाने के बाद भी....... !!









Saturday, February 11, 2012

लिखना जरूरी है ...

लिखना अक्सर मुझे उतना ही जरूरी लगता है ,जितना कि सांस लेना ॰ कई ऐसी चीज़ें हैं आस- पास जो विचलित कर देती हैं और उन्हे ठीक करना या मन मुताबिक करना मेरे वश में नहीं होता ॰ एक अजीब सी घुटन होती है तब और बस मेरी कलम ही निजात दिलाती है मुझे उस घुटन से ॰ मेरी कलम मेरे लिए एक अदृश्य मुक्ति का शंखनाद है ....उन जंजीरों से मुक्ति का घोष हैं ये, जो पैरों में नहीं दिमाग में लगाई जाती है ॰ पत्रकारिता के अनुभव ने बोलना सीखा दिया लेकिन चाहती हूँ उनकी आवाज़ बन सकूँ जिनके पास आज भी जुबां नहीं ॰ सिर्फ स्वांतः सुखाय नहीं लिखना चाहती मैं , शायद मेरी सीमाओं ने मुझे अब तक बहुत प्रॉडक्टीव नहीं बनने दिया समाज के लिए ॰ बहुत सारी गलत चीज़ें देखकर मैंने बंद कर लीं अपनी आँखे ॰ कभी बोल नहीं पायी और कभी बोलने नहीं दिया गया ,हर बार बहुत कुछ जमा हो गया अंदर,लेकिन लेखनी ने हर बार मुझे उबार लिया, मुक्ति दी ॰ मेरे शब्द अगर किसी एक को भी सुकून दे सके ,मुक्त कर सकें ,घुटन से निजात दिला सकें तो धन्य मानूँगी खुद को ॰ उस दिन ही सोचूँगी कि शब्दों को साध लिया मैंने ॰ तब तक बस लिख रही हूँ क्योंकि लिखे बिना रह नहीं सकती ॰