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Saturday, February 18, 2012

तुम नहीं हो यहाँ.....!!


बाहर बढ़ता जाता है
शोर जितना
मेरे अन्दर गहराता है
उतना ही सन्नाटा.......

आँखें बंद कर लेने पर भी
अट्टहास करते
रौशनी के समंदर की लहरें
चुभती रहती हैं आँखों में
किरचों की तरह........

रौशनी का यह समंदर
शीतलता, ऊर्जा,
या जीवन नहीं देता ....
देता है तो एक अंतहीन प्यास
और अपनी लघुता का एहसास ....


इस रौशनी में
रेंगते सभी साए
झूठ हो या न हो ......
उनके चेहरों की
अबूझ लकीरों को पढना
मुझे नहीं आता .. ....
और इनके इर्दगिर्द जिए जाना भी
उन्हें और खुद को भी
छलने जैसा ही है .....


यह जानकर भी
कि नहीं है निश्चित
तुम्हारा होना भी .....
शायद यह एक छलावा ही था मेरा
खुद को दिया हुआ .....
मैं खुद से कहती रही
हर बार .....

तुम हो यहाँ .....

लेकिन जब भी तुम्हे पुकारा
तुम सुन नहीं सके.....
क्योंकि तुम थे ही नहीं
थे तो बस
रौशनी के कुछ अबूझ टुकड़े...
 और कुछ चेहरे....
जिन पर लिखी इबारत
मुझे पढने नहीं आती
और कुछ शब्द
जिसके मायने
समझ नहीं पायी आजतक
नहीं......
तुम नहीं हो यहाँ ...
कभी नहीं थे ...
तुम्हारे होने का
एक भ्रम था बस ....!!







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