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Thursday, March 01, 2012

स्त्रियाँ बिगड़ गयी हैं आजकल ........!!




 स्त्रियाँ बिगड़ गयी हैं आजकल
लांघ रही हैं वर्जनाएँ  
जो कभी अधिकार क्षेत्र था
सिर्फ आपका  जनाब ......

तो क्यों न हो आपको चिंता .....!!
आखिर सवाल है 
हजारों वर्षों पुरानी संस्कृति का .....
यूँ उसे बर्बाद होते 
कैसे देख सकते हैं  आप .......!!

बाहर जाने की आज़ादी दे दी ....
नहीं रोका 
अपने पैरों पर खड़ा होने से.......... 
तो क्या हो जायेंगी इतनी उन्मुक्त ....!! 
 ढालने लगेंगी अपना जीवन
अपनी ही मर्ज़ी से ............!!
आपकी बराबरी करेंगी ....!!!

प्रेम की तो क्या बिसात 
करती हैं यह 
अब अलगाव  तक की बातें ......... !!
कसैला हो  गया है  मन आपका
सुनकर कडवे प्रतिउत्तर 
कहाँ गयी वह मिठास ...!!
कहाँ गयी वह आदर्श नारियां ........ 
जीती थी जो लेकर 
आँचल में दूध 
आँखों में पानी .....!!!

इनके विचारों की तरह ही 
स्वतंत्र हो गए हैं 
इनके पहनावे भी ...... 
घूमती हैं निडर अकेले 
उकसाती हैं बेचारे पुरुषों को ......
तभी तो होते हैं बलात्कार ..... !!

अरे..... घोर कलियुग आ गया है...
 स्वाभाविक है आपकी चिंता जनाब ....
 यह तो खतरा है...
चुनौती है....  
आपके साम्राज्य ....
आपके परिवार 
आपके समाज पर..... 
जहाँ वर्षों से 
विराजमान हैं  आप 
सर्वोच्च सिहांसन पर 
अविजित............

अब पछताने से 
फायदा भी क्या ........
जब आपने कर ही दी 
इनकी लगाम ढीली...... 
देखो इनकी बेशर्मी...... !!
सारी रस्सियाँ  ही खोल बैठी हैं.....
 घूम रही हैं स्वछंद 
बिना लगाम के ......
और जी रही हैं 
अपनी चाहतें .....

आह .....!
तभी तो आप 
दुहरा ही लेते हो 
पंक्तियाँ अपने पूर्वजों की ..... 
कितना रटाया था उन्होंने 
"ढोल ,गंवार  शुद्र  पशु नारी 
ये सब  हैं तारण के अधिकारी "
यह भी तो याद कर लेते 
कम से कम .........
"नहीं देनी चाहिए 
स्वतंत्रता स्त्री को 
किसी भी उम्र में "................
कहा था उस पितामह ने 
जो खुद नहीं दे पाया सुरक्षा 
द्रौपदी को 
कर्तव्यों की आड़ में ......

नहीं ................
कुछ भी तो  याद नहीं 
रख पाए आप ..........
 दे ही डाली  ....
इन्हें स्वतंत्रता ........!!

अब कुछ नहीं हो सकता जनाब ......
गयी अब आपकी सभ्यता -संस्कृति ....!!
और गया आपका सुशासन ......!!
स्त्रियाँ बिगड़ गयी हैं आजकल ........!!
जीने लगी  हैं अब वह ..........
अपनी ख्वाहिशें .........
तय करने लगी हैं
अपना भला बुरा 
खुद ही ........ !!
................................................

4 comments:

  1. रश्मि जी ..

    आपकी रचना का स्वर भारतीय समाज में सदियों से कृत्रिम प्रकार से सदाचरण के छद्म आवरण से जनित कुंठा का स्वर है .. यह आज नारी को उसकी अस्मिता के अहसास का स्वर है .. समस्त पुरूष समाज पर कटाक्ष करती हुयी यह अभिव्यक्ति एक सैलाब लेकर चलती प्रतीत होती है किन्तु भय है कि यह लहर कितनी दूर तक जा सकेगी .. बस शुभकामना साथ दे रहा हूं ..लिखते रहिये और रोष को संचित कीजिये .. यह अघोषित युद्ध मानसिक धरातल पर लड़ा जाना है.. साथ देने के लिये बहुधा मात्र ताली पीटन एवाले अधिक दूर तक नहीं चलते .. किन्तु यह भी सच है कि इस लड़ाई को नारी भी पुरूष के साथ मिल कर ही विजित होगी। इसेक लिये मात्र कुछ कवितायें और आलेख से यह समाप्त नहीं होना है .. लम्बी लड़ाई है .. और ताली बजाने वाले बहुत दूर तक साथ नहीं चलेंगे .. खुद को तैयार करिये मानसिक धरातल पर अपने विचारो के साथ चलने के लिये
    शुभम मंगलम

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  2. आपकी रचना का स्वर भारतीय समाज में सदियों से कृत्रिम प्रकार से सदाचरण के छद्म आवरण से जनित कुंठा का स्वर है .. यह आज नारी को उसकी अस्मिता के अहसास का स्वर है .. समस्त पुरूष समाज पर कटाक्ष करती हुयी यह अभिव्यक्ति एक सैलाब लेकर चलती प्रतीत होती है किन्तु भय है कि यह लहर कितनी दूर तक जा सकेगी .. बस शुभकामना साथ दे रहा हूं ..लिखते रहिये और रोष को संचित कीजिये .. यह अघोषित युद्ध मानसिक धरातल पर लड़ा जाना है.. साथ देने के लिये बहुधा मात्र ताली पीटन एवाले अधिक दूर तक नहीं चलते .. किन्तु यह भी सच है कि इस लड़ाई को नारी भी पुरूष के साथ मिल कर ही विजित होगी। इसेक लिये मात्र कुछ कवितायें और आलेख से यह समाप्त नहीं होना है .. लम्बी लड़ाई है .. और ताली बजाने वाले बहुत दूर तक साथ नहीं चलेंगे .. खुद को तैयार करिये मानसिक धरातल पर अपने विचारो के साथ चलने के लिये
    शुभम मंगलम

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  3. बहुत अच्छी कविता,रश्मिजी ..............बेबाक और हिम्मती !

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