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Sunday, March 04, 2012

हाँ ,इसे प्रेम ही कहेंगे शायद ..............

 हाँ ,इसे प्रेम ही कहेंगे शायद ..............
 कि हमारे बीच अब नहीं है जरुरत शब्दों के उस सेतू की
जिस पर चलकर ही कभी हम पहुँच पाते थे एक -दुसरे तक .....

आँखों के किनारों से टकराती हैं मौन की आतुर लहरें 
जिसमे निर्बंध तैरते रहते हैं हम  
साथ -साथ लेकिन फिर भी अलग .....
यह  अच्छी तरह जानते हुए कि डूबेंगे नहीं 
बिना एक दूसरे को लाइफ जैकेट की तरह पहने हुए भी .........

हाँ , यह प्रेम ही तो है .............................
 कि यह जानते हुए भी कि धीरे -धीरे समय की आंच पर सुलग रहे हैं रिश्ते 
और  घुल रहा है हवा में कार्बन मोनो आक्साईड
जो मुश्किल करता है सांस लेना भी 
हम सँजोये रखते हैं ताज़ी हवा की उम्मीद 
और बनाते रहते हैं  नयी खिड़कियाँ दीवारों में ....................
ताकि शीतल हवा के झोंके कम कर सकें जलन की तासीर 
और मिल सके घुटन से  निजात...............

इसे प्रेम नहीं तो और क्या कहेंगे ....................
कि रोज़ टूटते सपनों की किरचों पर चल कर होते हैं लहूलूहान 
 फिर भी खरीद लाते हैं अक्सर एक नया  झिलमिलाता सपना  
 और संभाल कर रख देते हैं शो -केस में
यह जानते हुए भी कि उसे भी टूट जाना है एक दिन 
यूँ ही ,कभी हमारी ही लापरवाही से ........
या फिर खो देनी  है अपनी रंगीनियत
 धूल की रोज़ ही चढ़ती मोटी परत के नीचे............ 
उसे चमकाते रहने की तमाम कवायदों के बाद भी ..............

सच कहा तुमने ,यह प्रेम ही होगा ..........
कि जानते हैं, मुश्किल है साथ चलना 
हम चलते रहते हैं समानांतर 
एक ही सड़क पर ................
बिना हाथों में हाथ डाले 
क्योंकि हमारा इंतज़ार करती जिन्दगी की ब्लू लाइन बस ने 
हमारा स्टॉप एक ही रखा है..............
और एक ही मंजिल भी ..............
और वो भी हमारे मशवरे पर ही .......
..............................................!
किसने कहा ,प्रेम आँखों में आँखें डाले 
 हाथ थामे ,साथ चलने का नाम है ...........!
आसमां नीला है और घास हरी 
प्रेम इस उम्मीद के जिन्दा रहने का नाम है 
हर उम्मीद के टूटते चले जाने के बाद भी ................!!






8 comments:

  1. प्रतीक कई बहुत अच्छे हैं.कविता पसंद किये जाने लायक है लेकिन एडिटिंग की ज़रूरत है.कई शब्द जैसे हमारे-तुम्हारे में से यदि तुम्हारे को निकाल दें तो भी बात वही रहती है लेकिन एक शब्द कम हो जाता है.कविता में स्पेस और पंक्चुएशन मार्क्स ज़रूरी हैं.इनमे चूक जाना आदत मत बनाओ.कुछ दिन बाद इसे फिर से रिवाइज करो तो यह स्वयं बेहतर हो जायेगी.

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  2. बाबा ,आपके सुझाव अमूल्य है और उन्हे follow करके मेरी कविता में निखार ही आएगा , वाकई वह तुम्हारा शब्द गैर जरूरी था .... आभार ...

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  3. शब्दों ने स्फुरण उत्पन्न किया अत: ब्लाग पर अबिलम्ब पढ़ा .. प्रेम की धारा को यथार्थ के धरातल पर एक कसौटी से परिभाषित करते हुये .. उसे अंतस की गहन अनुभूति प्रदान की है.. नि:शब्द हूं ।
    कई वर्ष पूर्व लिखी अपनी एक रचना की कुछ पंक्तियां बस ..

    ईश्वर और प्यार ...
    दोनों ही अस्तित्वहीन
    किन्तु चलते हैं,
    किसी मुद्रा की भांति
    ईश्वर ......
    आस्था का व्यापार
    और प्यार......
    रिश्तों के सांचों में...
    स्वार्थ का आधार

    सम्भवत: एक परिभाषा यह भी है

    सूरज हर दिन निकलता है .... [कविता एवं स्वर] - श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
    http://www.trishakant.com/2010/09/blog-post_07.html

    तृषाकान्त: सूरज हर दिन निकलता है .... [कविता ए

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  4. हम सँजोये रखते हैं ताज़ी हवा की उम्मीद
    और बनाते रहते हैं नयी खिड़कियाँ दीवारों में ..................
    प्रेम सहज मानवीय स्वभाव है ..जीवन में बने रहने के तमाम यत्न करता है ...मुश्किलों के बावजूद ...इस कशमकश का कागज़ पर उतरना ..उसे पढ़ना ..अच्छा लगा ..बधाई !

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  5. आप की कविता -भाषा में सहजता बढ़ी है , और साथ ही सांकेतिकता और कसावट भी भी .यह देखना सुखद है .ऐसी कविता पढ़ना एक सुकून देता है . आप की कविता शायद के एक अनिश्चय के साथ शुरू होती है , और उस से जूझती चलती है .लगता है कि अंत तक आते आते अनिश्चय समाप्त हो गया , लेकिन दरअसल होता नहीं . इसी में कविता बची रहती है . लेकिन कभी कभी मैं सोचता हूँ कि नाम का अर्थ खोजना अधिक जरूरी है या अर्थ का नाम खोजना !

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  6. अब कविता में पहले की तुलना में कसावट आई है और इसीलिये यह ज्यादा प्रभावी बन गयी है.कविता का अंत बहुत अच्छा है. कुल मिलाकर कविता पढना सुखद रहा.प्रेम पर लिखना आसान नहीं है लेकिन तुमने लिखा और इसे अवांछित सम्पृक्ति से बचा भी लिया यह किसी कमाल से कम नहीं है .अब मैं बधाई देता हूँ --- बधाई रश्मि.

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  7. "सच कहा तुमने ,यह प्रेम ही होगा ..........
    कि जानते हैं, मुश्किल है साथ चलना
    हम चलते रहते हैं समानांतर
    एक ही सड़क पर ................"

    एक मूक समझौता......प्रेम और जीवन के साथ......आशावादी स्वर लिए सुंदर अभिव्यक्‍ति।

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  8. रोज़ टूटते सपनों की किरचों पर चल कर होते हैं लहूलूहान
    फिर भी खरीद लाते हैं अक्सर एक नया झिलमिलाता सपना
    और

    प्रेम इस उम्मीद के जिन्दा रहने का नाम है
    हर उम्मीद के टूटते चले जाने के बाद भी ................!!

    अत्यंत महत्वपूर्ण और मार्मिक पंक्तियाँ हैं तथा प्रेम करते हुए जीने का संबल भी।
    बहुत अच्छी भावाभिव्यक्ति के लिए बधाई।

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