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Monday, July 02, 2012

बिजूका



देह और मन की सीमाओं में 
नहीं बंधी होती है गरीब की बेटी....
अपने मन की बारहखड़ी पढ़ना उसे आता ही नहीं
और देह उसकी खरीदी जा सकती है
टिकुली ,लाली ,बीस टकिये या एक दोने जलेबियों के बदले भी ....

गरीब की बेटी नहीं पायी जाती
किसी कविता या कहानी में
जब आप उसे खोज रहें होंगे
किताबों के पन्नों में ........
वह खड़ी होगी धान के खेत में,टखने भर पानी के बीच
गोबर में सनी बना रही होगी उपले
या किसी अधेड़ मनचले की अश्लील फब्तियों पर ...
सरेआम उसके श्राद्ध का भात खाने की मुक्त उद्घोषणा करती
खिलखिलाती, अपनी बकरियाँ ले गुजर चुकी होगी वहाँ से .....

आप चाहें तो बुला सकते हैं उसे चोर या बेहया
कि दिनदहाड़े , ठीक आपकी नाक के नीचे से
उखाड़ ले जाती है आलू या शक्करकंद आपके खेत के
कब बांध लिए उसने गेहूं की बोरी में से चार मुट्ठी अपने आँचल में
देख ही नहीं सकी आपकी राजमहिषी भी .....

आपकी नजरों में वह हो सकती है दुश्चरित्र भी
कि उसे खूब आता है मालिक के बेटे की नज़रें पढ़ना भी
बीती रात मिली थी उसकी टूटी चूड़ियाँ गन्ने के खेत में ....
यह बात दीगर है कि ऊँची – ऊँची दीवारों से टकराकर
दम तोड़ देती है आवाज़ें आपके घर की
और बचा सके गरीब की बेटी को
नहीं होती ऐसी कोई चारदिवारी ......

गरीब की बेटी नहीं बन पाती
कभी एक अच्छी माँ
कि उसका बच्चा कभी दम तोड़ता है गिरकर गड्ढे में
कभी सड़क पर पड़ा मिलता है लहूलूहान....
ह्रदयहीन इतनी कि भेज सकती है
अपनी नन्ही सी जान को
किसी भी कारखाने या होटल में
चौबीस घंटे की दिहारी पर .......

अच्छी पत्नी भी नहीं होती गरीब की बेटी
कि नहीं दबी होती मंगलसूत्र के बोझ से....
शुक्र बाज़ार में दस रुपए में
मिल जाता है उसका मंगलसूत्र
उसके बक्से में पड़ी अन्य सभी मालाओं की तरह ....

आप सिखा सकते हैं उसे मायने
बड़े-बड़े शब्दों के
जिनकी आड़ में चलते हैं आपके खेल सारे
लेकिन नहीं सीखेगी वह
कि उसके शब्दकोश में एक ही पन्ना है
जिस पर लिखा है एक ही शब्द
भूख... 
और जिसका मतलब आप नहीं जानते ....

गरीब की बेटी नहीं जीती
बचपन और जवानी
वह जीती है तो सिर्फ बुढ़ापा
जन्म लेती है , बूढ़ी होती है और मर जाती है
इंसान बनने की बात ही कहाँ ..... !
वह नहीं बन पाती एक पूरी औरत भी ....
दरअसल , वह तो आपके खेत में खड़ी एक बिजूका है
जो आजतक यह समझ ही नहीं पायी
कि उसके वहाँ होने का मकसद क्या है ....

10 comments:

  1. सही बात हे गरीब की बिटिया वाकई जीवन जीने को तरसती हे
    सही चित्रण

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  2. निशब्द हो गयी मै ..................

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  3. गरीब की बेटी की यह हालत अमीर ही करते है. भगवान बदलाr दिलाने के लिए उनके घर में भी एक बेटी पैदा करता है उनकी इज्जत को ख़तम करने के लिए . जो आज कल अमीरों की बेटियां कर रही है. फिल्मो के द्वारा अश्लील चित्रों के द्वारा उनकी इज्जत का तमासा बना रही है .....इस टापिक पर भी कविता लिखिए तो अच्छा लगेगा लेकिन आप नहीं लिखेंगी......क्योंकि ....आप भी गरीब की बेटी की इज्जत उछाल कर मसहूर होना ...........

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  4. anonymous जी , कृपया अपने सही परिचय के साथ कमेंट करें , और कृपया ध्यान से फिर कविता पढ़ें... यहाँ किसकी आलोचना की गयी है ... आपने जो सुझाव दिया उस ;पर जरूर लिखूँगी कविता ... धन्यवाद

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  5. सभी मित्रों का कविता पसंद करने के लिए आभार

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  6. भूख और अभावों में जलती हुई जिंदगियाँ जीवन का सिर्फ एक ही अर्थ जानती हैं --रोटी !बाकी सारे जीवन-अर्थ इस अर्थ-शिला के नीचे दब कर दम तोड़ देते हैं ! बहुत अच्छी तरह सोंच-विचार कर लिखी इस कविता में ऐसे ही अभावग्रस्त जीवन की मार्मिक झाँकी देखने को मिलती है ! इस अच्छी प्रभावशाली कविता के लिए रश्मि को बधाई !

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  7. नारी नदी एक जैसी,
    बहती बलखाती,
    चलती अनखाती,
    बन चरण दासी,
    फिर भी रह जाती प्यासी।
    अमीरी गरीबी नारी से नारी के नारित्व को विभक्त नही करते,
    अपितु पुरुष की गरिमा पर चोट करते हैं.....क्यों कि, पुरुष स्वामी जो बन बैठता है....
    कितनों पढ़ी सुनी देखी ग़रीब स्त्री....कितनो ने अनुभव किया ममता का गला घुंठता हुआ...एक ये कविता यदि प्रसिद्ध करती है किसी को तो उसे अधिकार है प्रसिद्ध होने का।

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  8. Bahut sundar srijan, badhai.
    kripaya mere blog par bhee padharane kaa kasht karen.

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