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Saturday, February 11, 2012

लिखना जरूरी है ...

लिखना अक्सर मुझे उतना ही जरूरी लगता है ,जितना कि सांस लेना ॰ कई ऐसी चीज़ें हैं आस- पास जो विचलित कर देती हैं और उन्हे ठीक करना या मन मुताबिक करना मेरे वश में नहीं होता ॰ एक अजीब सी घुटन होती है तब और बस मेरी कलम ही निजात दिलाती है मुझे उस घुटन से ॰ मेरी कलम मेरे लिए एक अदृश्य मुक्ति का शंखनाद है ....उन जंजीरों से मुक्ति का घोष हैं ये, जो पैरों में नहीं दिमाग में लगाई जाती है ॰ पत्रकारिता के अनुभव ने बोलना सीखा दिया लेकिन चाहती हूँ उनकी आवाज़ बन सकूँ जिनके पास आज भी जुबां नहीं ॰ सिर्फ स्वांतः सुखाय नहीं लिखना चाहती मैं , शायद मेरी सीमाओं ने मुझे अब तक बहुत प्रॉडक्टीव नहीं बनने दिया समाज के लिए ॰ बहुत सारी गलत चीज़ें देखकर मैंने बंद कर लीं अपनी आँखे ॰ कभी बोल नहीं पायी और कभी बोलने नहीं दिया गया ,हर बार बहुत कुछ जमा हो गया अंदर,लेकिन लेखनी ने हर बार मुझे उबार लिया, मुक्ति दी ॰ मेरे शब्द अगर किसी एक को भी सुकून दे सके ,मुक्त कर सकें ,घुटन से निजात दिला सकें तो धन्य मानूँगी खुद को ॰ उस दिन ही सोचूँगी कि शब्दों को साध लिया मैंने ॰ तब तक बस लिख रही हूँ क्योंकि लिखे बिना रह नहीं सकती ॰