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Sunday, February 12, 2012

क्यों अनचीन्हा सा लगता है ये वक्त........ प्यार के इस मौसम की तरह...



प्यार का यह मौसम गुजर जाने के बाद 
मैं तलाशूंगी तुम्हारा चेहरा 
कुछ सूखे फूलों में, 
कुछ संभाल कर रखे गए ग्रीटिंग कार्ड्स में.
उन लम्हों की धूल हटाकर 
खोजूंगी तुम्हे वहां भी  ....
जिन पर लिखे थे 
कुछ सपने 
तुम्हारे नाम के साथ .....

उस गुलाबी  डायरी के
पीले पड़ आये पन्नों के  
 दिल  पर भी
 उकेरे थे कुछ शब्द....
जो कभी जिए नहीं जा सके
तुम्हारे संग 
एक उम्र जी लेने के बाद भी...... .
और जिन्हें जीने की हसरतें भी 
अब मरती जा रहीं हैं.....

अपनी उँगलियों की तपिश से 
 फिर एक बार .....
 जिन्दा करना चाहूंगी उन्हें ....

समझना है मुझे इस बार 
क्यों बाहर के मौसम के साथ 
बदल जाता है
 अन्दर का मौसम भी.... 
क्यों ठिठक जाती है धूप
कितनी बर्फ जमा हो जाती है 
जो निकलती ही रहती है
 पिघलकर 
ताउम्र 
आँखों के रास्ते ..........

क्यों यह भीड़  अब भी
याद दिलाती रहती है 
सिर्फ तुम्हारा चेहरा.... 
और क्यों हर वो चीज़ 
अब भी........ 
 हो जाती है मेरे करीब 
जो गुजरती है तुम्हे छू कर ....

समझना है मुझे 
क्यों नहीं लिख पायी आज तक 
मैं तुमपर कविता .......
 जबकि तुम्हे  ही तो होना था 
मेरी कविता का पर्याय.........

क्यों अनचीन्हा सा लगता है ये वक्त 
प्यार के इस मौसम की तरह...... .
और क्यों साथ होने पर भी 
 रहता है 
तुम्हारा इंतज़ार ....... 
प्यार का  यह मौसम 
गुजर जाने के बाद भी....... !!