© : All rights reserved

Thursday, March 01, 2012

सिल्क स्मिता के बहाने !


बहुत देर से देखी डर्टी पिक्चर . वजह बिलकुल साफ़ थी इसका डर्टी होना , बस मौका तलाश रही थी कि कभी बिटिया नहीं हो आस -पास तो देखूं . कई सवाल छोड़ दिए इस फिल्म ने जेहन में . क्या गुनाह है, अगर किसी स्त्री ने खुद संभाल ली अपनी देह की बागडोर ! क्यों इतना हंगामा अगर उसने खुद लिए अपनी देह से जुड़े फैसले ! अगर यही फैसले एक पुरुष लेता है ,जो कि लेता भी आया है सदियों से , तो किसी को कोई तकलीफ नहीं होती , क्योंकि स्त्री की आत्मा की तरह ही उसके शरीर पर भी उसका कोई अधिकार नहीं . पुरुष की मर्ज़ी उसे जैसे चाहे उपभोग करे , स्त्री को सिर्फ उसके आनंद का , उसकी मर्ज़ी का ख्याल रखना है . वह हाड- मांस की बनी हुई इंसान नहीं एक कठपुतली है समाज के लिए जिसको नियंत्रित करने के धागे हमेशा ही समाज के , उसके कर्ता- धर्ता , उसके ' स्वामी ' के हाथ में रहते हैं . इस फिल्म की एक पात्र है ' नायला ' ,जो एक गॉसिप पत्रिका की जर्नलिस्ट है , वह कहती है ;" हमेशा से पुरुषों को देवता बनाने के लिए औरतों को शैतान बनाना ही पड़ता है ". यह एक टिप्पणी बहुत कुछ कह जाती है औरतों के भूत ,वर्तमान और भविष्य के बारे में . इतिहास गवाह है कि अपने फैसलों को जायज ठहराने के लिए हमारे समाज ने सदा से एक औरत को ही शैतान बनाया है , मंथरा , कैकई से लेकर द्रौपदी तक की गाथाएँ चीख -चीख कर पूछती हैं कि क्या अपने फैसलों का बोझ खुद उठाने की हिम्मत नहीं थी , या किसी स्त्री की छाती पर पैर रखकर ही महानता का तमगा लेना था ! सिल्क सरीखे जिस्म भी समाज ही बनता है ,उसे चाहिए ऐसी गठी हुई देह अपने मनोरंजन के लिए और उस पर मज़े की बात यह कि उस देह की कमान भी वह अपने हाथ में ही रखना चाहता है . सिल्क चुभने लगी उस समाज को जो  औरतों को  उड़ते हुए देखने का आदी नहीं थी , जिसके लिए पत्नी , प्रेमिका और रखैल के अलग -अलग मापदंड तय है और जिनसे इंच मात्र हिलने की उम्मीद वह औरतों से नहीं करता. सिल्क ने गलती कर दी ,उसने अपनी देह अपनी मान ली . फिर कैसे जीने देता उसे यह समाज चैन से ! हो सकता है सिल्क का रास्ता गलत हो, लेकिन कौन तय करेगा इसके मापदंड , कितना क्या गलत है, किसके लिए ,किसने लिखे यह नियम ! जवाब शायद पता हैं आप को . पुरूषों की बनायीं इस दुनिया में स्त्री के लिए बहुत कुछ गलत है ,जो उनके खुद के लिए उनका पुरुषत्व है ,उनकी मर्दानगी का सुबूत . फिल्म का हीरो सिल्क से पहले ५०० लड़कियों के साथ' टयूनिंग ' कर चूका होता है ,लेकिन वह गलत नहीं . और माफ़ करेंगे ऐसा सिर्फ फिल्मों में नहीं होता , फ़िल्में तो थोड़े मसाले के साथ हमारे आस -पास का सच ही दिखाती हैं .पाप पुण्य का हिसाब बाद में कर लेंगे ,समाज पर पड़ने वाले प्रभाव की परताल भी ,अभी बस यही सवाल बैचैन करता है ,क्यों इतना मुश्किल है एक स्त्री के लिए अपनी शर्तों पर जीना ! सिल्क से लेकर परवीन बौबी तक , राखी सावंत से लेकर पूनम पाण्डेय तक और गली में आने वाली उस धोबन तक,( जो अपने शराबी पति को छोड़ आई है लेकिन खुश है, सजती सम्बरती है ),जिसने भी जीना चाहा है अपनी जीवन अपनी शर्तों पर ,उसके लिए इतनी हेय दृष्टि क्यों है समाज की ! क्यों दिया जाता है उसे एक बुरी ,बिगड़ी हुई औरत का दर्ज़ा ? इस समाज के वह सारे  नियम तब कहाँ चले जाते है, जब एक पुरुष की बारी आती है ,समाज चुप रहता है ,उसकी गलतियों पर  , दबे स्वर में शिकायत करता भी है तो यह जोड़ता है साथ में : अरे ,मर्द की जात ही ऐसी होती है , और लो मिल गया लाइसेंस हर गलती का , हर हदें तोड़ने का . वैसे भी समाज का पालनहार , समाज का रक्षक पुरुष ही है तो अपने ही अस्तित्व पर वह क्यों लगाने लगा प्रश्न चिह्न ! अपने खुद के लिखे नियमों की वह क्यों करने लगा खिलाफत !. सीधी सी बात है हजारों- लाखों साल बाद भी जहाँ औरतों का सवाल आता है ,कुछ नहीं बदला बल्कि स्थिति बदतर होती गयी है . औरतों ने जीने की मुहिम छेड़ दी है बिना यह ठीक से परखे कि समाज तो आज भी उसे आले या दीवार पर सजी देवी प्रतिमा की तरह ही देखना चाहता है , जीती -जागती देवी , जिसे जब चाहे वह रौंद दे लेकिन जिसके पास उफ़ तक करने की भी जुबान नहीं हो , फिर वह कैसे झेल पायेगा हाड -मांस की उस औरत को जो अपनी कामना को जुबान देने लगी हो ,अपनी ख्वाहिशें जीने लगी हो . हमारी सभ्यता -संस्कृति को जिन्दा रखने ,उसकी गरिमा को बचाए रखने का सारा दारोमदार बड़ी ही चालाकी से औरतों के कंधे पर डाल दिया गया है इसलिए पुरुष खुद चाहें तो संसद में बैठकर पोर्न देखे ,और हर लड़की के शरीर का एक्स रे कपड़ों के अन्दर से भी लेते रहें , एक पूनम पाण्डेय  ने थोड़े कपडे क्या उतार दिए इनकी शेषनाग के फन पर टिकी कालजयी संस्कृति अब गिरी कि तब गिरी वाली हालत में आ जाती है . अब तो शर्म करो थोडा . सच को कबूलने की हिम्मत लाओ . बहुत बुरी है सिल्क , मल्लिका , पूनम फिर क्यों हिट हैं ये , इसलिए कि तुम्हे इन्हें देखना अच्छा लगता है , अगर यह नहीं दिखाए तो तुम ऐसे हालत पैदा कर ही लोगे ,संस्कृति के ठेकेदारों कि तुम्हारा आनंद का कोटा बदस्तूर चलता रहे . तो बस सीधा सा हिसाब है ,सभी फैसले तुम्हारे ही थे ,जिए तुमने , अब उन्हें भी जीने दो जैसे वह जीना चाहती हैं .उनका जीवन है और उन्हें बेहतर पता है अपना भला -बुरा .वह भी इंसान है और उन्हे भी हक़ है अपने जीवन से जुड़े निर्णय लेने का . समाज की मेंटल कन्डीशनिंग की इंतेहा तो तब हो जाती है जब औरतें खुद जायज ठहराती है, अपने पैरों की बेड़ियों को . एक मित्र जो बहुत ही धार्मिक और घरेलू महिला हैं , समाज के बनाए दायरों में रहने वाली एक अच्छी औरत’, ने सिल्क सरीखों की चर्चा चलने पर कहा  ; “अरे ऐसी औरतें कलंक हैं हमारे समाज पर . मर्द बिचारे भी क्या करें , कब तक बचाएं खुद को . ऐसी औरतों की यही नियति होती है ". मैं एक ठंडी सांस लेकर उन्हे देखती हूँ . जो जिया आज तक ,जो सिखाया गया जन्म से वही तो कह रही हैं , गलत क्या कहा . “ज़ोर से मत हंसो , आराम से चलो , दुपट्टा ठीक से रखो ,पति का घर ही सब कुछ , रसोई की दक्षता सर्वप्रथम है , ऑलराउंडर बनो , पेंटिंग ,सिलाई ,घर सजाने से लेकर गणित के सवालों तक , शाम में दोस्त के घर पार्टी ,भाई साथ जाएगा , दोस्तों के साथ फिल्म ,भले घर की लड़कियां नहीं जाती ,लोग क्या कहेंगे ”, लंबी सूची है , लेकिन हर लड़की गुजरती है इन हिदायतों से ,कभी घर वाले ,कभी आस –परोस , उन्हे बाध्य करते हैं , समझाते  हैं कि देखो यही रास्ता है , नाक की सीध पर चलती रहो ,बिना सवाल उठाए , और  जिन्होने भी रास्ता बदला , उनकी स्थिति या यूं कहें कि दुर्गति वही होती है जो सिल्क की हुई . आज भी आए दिन अखबारों में पढ़ती ही रहती हूँ ,फलां मॉडेल ने आत्म- हत्या कर ली, फलां किशोरी ने खुद को फांसी चढ़ा लिया वगैरह . सिल्क तो 80 के दशक की थी ,आज 21वीं सदी में भी कुछ नहीं बदला . कामसूत्र और खजुराहो के इस देश में आज भी सेक्स शब्द पर बात करना गुनाह है , खासकर महिलाओं का , उन्होने यह लक्ष्मण रेखा पार की नहीं कि उन्हे आज भी बुरी लड़कियों कि फ़ेहरिश्त में डाल दिया जाता है . समझ से परे है यह मानसिकता , सदियों से नगरवधू रखने की परंपरा वाला यह देश , एक पूरी कॉलोनी रेडलाइट एरिया के नाम से बसाने वाला यह देश क्यों नहीं हजम कर पाता सिल्क को या राखी सावंत को जो माद्दा रखती है खुलकर अपने शरीर पर बोलने का , जिन्हे पता है अपने शरीर की कीमत और उसे कैश करने के सारे हुनर भी बखूबी आते हैं उन्हे . बहुत बुरी हैं ये औरतें , चलिये मान लिया , हमारी आदर्श संस्कृति पर धब्बा , तो बंद कर दीजिये इनकी दूकानें. जीने का हक़ छीनने से अच्छा है ,  जीवन नारकीय बनाने  से अच्छा है ,इन्हे पैदा ही मत होने दीजिये . मत देखिये इन्हे , चोरी छुपे भी , मत आहें भरिए अकेले में भी . खुद ही खत्म हो जाएंगी ये बुरी औरतें जो बिगाड़ रही हैं आपको , आपकी सभ्यता , आपकी हजारों वर्षों पुरानी कालजयी संस्कृति को .... !! आपने सैद्धान्तिक तौर पर तो इन्हे देवी बनाए रखा और अंदर ही अंदर इन्हे सिर्फ एक शरीर समझा जो हर  तरह से आपका बोझ उठाती रही सदियों से . अब कुछ चालाक औरतों ने ,जिन्हे समझ में आ गया आपका यह षड्यंत्र और इंकार कर दिया देवी बनने से और खुल कर संभाल ली अपनी देह की कमान तो इतना हँगामा क्यों ...... !! निर्णय लीजिये पहले खुल कर , निकालिए खुद को दुविधा से कि आपको देवी चाहिए या शरीर , या अलग – अलग खांचे ही बनाए रखेंगे आप , सुविधानुसार इस्तेमाल करते रहने के लिए .......... और अपनी दुर्बलता का ठीकरा फोड़ते रहेंगे  इन बुरी औरतों” के सर ही . मुझे पता है मेरा यह लिखना भी आपको फूटी आँख नहीं भाएगा , मैं भी तो औरत हूँ न और आपके हिसाब से आज मैंने भी कर लिया अपनी सीमा का अतिक्रमण , तो बस पिल पड़िए मुझ पर , राखी , सिल्क , ममता शर्मा  या खुशबू पर , और याद दिला दीजिये सबको कि हमारे इस देश में शरीर पर बात करने का हक़ सिर्फ आपका है , सिर्फ आपका ........ और हवा में उछालने शुरू कर दीजिये सभ्यता , संस्कृति , परंपरा , मर्यादा , नैतिकता जैसे बड़े – बड़े शब्द जो आपने गढ़े ही हैं औरतों को नियंत्रण में रखने के लिए ........ 

स्त्रियाँ बिगड़ गयी हैं आजकल ........!!




 स्त्रियाँ बिगड़ गयी हैं आजकल
लांघ रही हैं वर्जनाएँ  
जो कभी अधिकार क्षेत्र था
सिर्फ आपका  जनाब ......

तो क्यों न हो आपको चिंता .....!!
आखिर सवाल है 
हजारों वर्षों पुरानी संस्कृति का .....
यूँ उसे बर्बाद होते 
कैसे देख सकते हैं  आप .......!!

बाहर जाने की आज़ादी दे दी ....
नहीं रोका 
अपने पैरों पर खड़ा होने से.......... 
तो क्या हो जायेंगी इतनी उन्मुक्त ....!! 
 ढालने लगेंगी अपना जीवन
अपनी ही मर्ज़ी से ............!!
आपकी बराबरी करेंगी ....!!!

प्रेम की तो क्या बिसात 
करती हैं यह 
अब अलगाव  तक की बातें ......... !!
कसैला हो  गया है  मन आपका
सुनकर कडवे प्रतिउत्तर 
कहाँ गयी वह मिठास ...!!
कहाँ गयी वह आदर्श नारियां ........ 
जीती थी जो लेकर 
आँचल में दूध 
आँखों में पानी .....!!!

इनके विचारों की तरह ही 
स्वतंत्र हो गए हैं 
इनके पहनावे भी ...... 
घूमती हैं निडर अकेले 
उकसाती हैं बेचारे पुरुषों को ......
तभी तो होते हैं बलात्कार ..... !!

अरे..... घोर कलियुग आ गया है...
 स्वाभाविक है आपकी चिंता जनाब ....
 यह तो खतरा है...
चुनौती है....  
आपके साम्राज्य ....
आपके परिवार 
आपके समाज पर..... 
जहाँ वर्षों से 
विराजमान हैं  आप 
सर्वोच्च सिहांसन पर 
अविजित............

अब पछताने से 
फायदा भी क्या ........
जब आपने कर ही दी 
इनकी लगाम ढीली...... 
देखो इनकी बेशर्मी...... !!
सारी रस्सियाँ  ही खोल बैठी हैं.....
 घूम रही हैं स्वछंद 
बिना लगाम के ......
और जी रही हैं 
अपनी चाहतें .....

आह .....!
तभी तो आप 
दुहरा ही लेते हो 
पंक्तियाँ अपने पूर्वजों की ..... 
कितना रटाया था उन्होंने 
"ढोल ,गंवार  शुद्र  पशु नारी 
ये सब  हैं तारण के अधिकारी "
यह भी तो याद कर लेते 
कम से कम .........
"नहीं देनी चाहिए 
स्वतंत्रता स्त्री को 
किसी भी उम्र में "................
कहा था उस पितामह ने 
जो खुद नहीं दे पाया सुरक्षा 
द्रौपदी को 
कर्तव्यों की आड़ में ......

नहीं ................
कुछ भी तो  याद नहीं 
रख पाए आप ..........
 दे ही डाली  ....
इन्हें स्वतंत्रता ........!!

अब कुछ नहीं हो सकता जनाब ......
गयी अब आपकी सभ्यता -संस्कृति ....!!
और गया आपका सुशासन ......!!
स्त्रियाँ बिगड़ गयी हैं आजकल ........!!
जीने लगी  हैं अब वह ..........
अपनी ख्वाहिशें .........
तय करने लगी हैं
अपना भला बुरा 
खुद ही ........ !!
................................................