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Friday, March 23, 2012

यह समय है !


यह समय है,
जब हमारे आस-पास रेंग रहे हैं कई बेखौफ गिरगिट
जो पलक झपकते ही हो जाते हैं हरे या भूरे
खुली आँखें भी देखतीं हैं फिर एक भ्रम
मिट जाता है फर्क असली और नकली का...
 यह समय है,
जब निराशा के ग्रहण
निगल लेते हैं इंसानियत का सूरज
और जो सूरज चमक रहा होता है
 उसे उधार लेनी पड़ती है रौशनी
अँधेरों से...
एक ऐसा समय,
जब निष्पक्षता कर देती है अकेला
और अपना वजूद बनाए रकने के लिए
बनना होता है परजीवी
 किसी और की ऊर्जा का
यह समय नहीं,
जिसे जिया जाये अपनी शर्तों पर...
जहां बह सके आदर्शों की कोई धारा
अपने खुद के ग्लेशियर के सहारे...
यह समय है,
जहां नागफनी की फसल पर लेटी मानवता
कराह रही है
घायल...
लेकिन बेअसर है हरेक मरहम
यह समय है,
 जहाँ कई आवाज़ें
शोर ठहरा दी जातीं हैं
और एक अकेली आवाज
गुम हो जाती है कई आवाज़ों के शोर में...
ऐसे ही एक समय में,
विचलित मन
बो रहा है बीज़
प्रार्थनाओं के...
कल शायद लहलहा सके
एक नए समय के अंकुर,
नयी उम्मीदों,
नए सपनों के साथ...  
प्रेम और मैत्री के साथ...
शांति और सह-अस्तित्व के साथ...
उस दिन एक नया सूरज भी निकलेगा
नयी रौशनी के साथ ...