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Saturday, April 07, 2012

वह कुछ नहीं कहेगी....!!


हथेलियों की लाल- हरी चूड़ियाँ खिसका कर
वह टाँकती है कुछ अक्षर
और दुपट्टे के कोने से पोंछ लेती है
अपनी हदें तोड़ते बेशर्म काजल को ....

माँ के नाम रोज़ ही लिखती है वह चिट्ठियाँ
और दफन कर देती है उसकी सिसकियों को
सन्दूक के अँधेरों में
दम तोड़ने के लिए....

वही सन्दूक जिसे माँ ने
उम्मीदों के सतरंगी रंगों से भरा था
और साथ ही भरी थीं कई दुआएं
बिटिया के खुशहाल जीवन की ....

माँ को अलबत्ता भेजी जाती हैं
कुछ खिलखिलाहटें अक्सर ही
जिसे सुनकर थोड़ा सा और
जी लेती हैं वह ....

मर ही जाएंगी वह
गर जानेंगी कि
उनकी बिटिया के माथे पर चिपकी गोल बिंदी से
 सहमा सूरज
 सदा के लिए भूल गया है
देना अपनी रोशनी ….
 और उसके घर अब चारों पहर
बसता हैं सिर्फ अंधेरा ....

कैसे जी पाएँगी वह
गर जानेंगी कि
उसकी मांग में सजी सिंदूर की  सुर्ख लाल रेखा
बंटी हुई है
कई और रेखाओं में
और झक्क सफ़ेद शर्ट पर
रेंगती आ जाती हैं वह 
उसके बिस्तर तक भी ....

कैसे सुन पाएँगी वह
कि पिछली गर्मियों
जिन नीले निशानों पर
लगाया करती थी
वह ढेर सारा क्न्सीलर
वह किसी के प्रेम की निशानी नहीं थे ....

नहीं , वह कुछ नहीं कहेगी....!!
और शायद कभी खुद भी
दफन कर दी जाएगी
किसी सन्दूक में
हमेशा के लिए ….